कृत्य तुम्हारा चेतन हो : गीता

ज्ञानयोग में निरंतर दृढ़ स्थिति : दैवी संपदा का तृतीय गुण

जिसे हम अवेयरनेस कहते हैं, महावीर ने जिसे सम्यक ज्ञान कहा है, बुद्ध ने जिसे सम्यक स्मृति कहा है और कबीर-नानक ने जिसे सुरति कहा है, ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति का वही अर्थ है। व्यवहार मूर्छित न हो; अचेतन शक्तियाँ मुझसे कुछ न करवा लें; मेरा कृत्य चेतन हो, कॉन्शस हो।

हमारा जीवन ऐसा है, जिसे हम मूर्छा में दृढ़ स्थिति कह सकते हैं। जो भी हम करते हैं, सोए हुए करते हैं। हमें कुछ पक्का पता नहीं होता कि हम क्यों कर रहे हैं; क्यों हमने क्रोध किया, क्यों हमने प्रेम किया, क्यों हमने ईर्ष्या की, क्यों हमने वैमनस्य किया, क्यों हमने जीवन ऐसा बिताया, क्यों हमने वैसा बिताया—कुछ साफ नहीं है।

एक अँधेरे में शराब पिए हुए जैसे कोई आदमी चलता हो और कहीं भी पहुँच जाए; न रास्ते का कुछ पता है, न दिशा का कोई पता है। यह भी हो सकता है कि वह गोल घेरे में चक्कर ही लगाता रहे और सोचे कि बड़ी यात्रा हो रही है। ऐसी ही हमारी दशा है। मूर्छा में हमारी दृढ़ स्थिति है।

ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति का अर्थ है जागरूकता में दृढ़ स्थिति, अवेयरनेस में दृढ़ स्थिति। होश में उठूँ, बैठूँ, चलूँ; जो भी व्यवहार हो, आचरण हो, जो भी क्रिया हो, वह मेरे पूरे होश में हो। मेरे ज्ञान का दीया जलता रहे। मैं क्या कर रहा हूँ, इसकी मुझे पूरी प्रतीति हो, इसका मुझे भान हो। बिना होश के कुछ भी मुझसे न हो।

मानो किसी आदमी ने आपको धक्का दिया। इधर धक्का दिया कि उधर से क्रोध की लपट भभक उठी। यह क्रोध का भभकना वैसे ही है, जैसे किसी ने बटन दबाया और बिजली जल गई। बटन दबाने के बाद बिजली का बल्ब सोचता नहीं कि जलूँ या न जलूँ। यंत्रवत्, यंत्र ही है, तो बिजली का बल्ब जल जाता है।

जब कोई आपको धक्का देता है और क्रोध भी आपमें ऐसे ही पैदा होता है, जैसे बटन दबाने से बल्ब जलता है, तो आप भी यंत्रवत् हो गए। जिस आदमी ने आपको धक्का दिया, उसने आपको स्टार्ट कर लिया; वह आपका मालिक हो गया। उसने आपमें क्रोध पैदा करवा लिया।

शायद आपने कई बार कसमें खाई हैं कि अब क्रोध नहीं करूँगा। कई बार सोचा है कि क्रोध दुख देता है। शास्त्र के शब्द स्मरण हैं कि क्रोध अग्नि है, विष है, जहर है। लेकिन किसी ने धक्का दिया तो वह सब एकदम साफ हो जाता है और भीतर से क्रोध उठ आता है।

यह क्रोध मूर्छा है।

बुद्ध को कोई धक्का दे, तो क्रोध ऐसे ही नहीं उठता, क्रोध उठता ही नहीं। बुद्ध धक्के को देखते हैं कि धक्का दिया गया और अपने भीतर देखते हैं कि धक्के से क्या हो रहा है। फिर निर्णय करते हैं कि मुझे क्या करना है। आपका धक्का निर्णायक नहीं है। आपके धक्के के बाद भी बुद्ध ही निर्णायक हैं।

आप जब क्रोध करते हैं, तो निर्णय आपका नहीं है। दूसरा आपसे निर्णय करवा लेता है। कोई चमचा आ जाता है, आपकी प्रशंसा करता है और आपसे काम करवा लेता है। आप भी जानते हैं कि यह चमचागिरी है और आप यह भी जानते हैं कि किसी की स्तुति में पड़ना ठीक नहीं है। लेकिन कोई स्तुति करता है, तो फिर स्मरण नहीं रहता। फिर भीतर कुछ बल्ब जल जाते हैं। भीतर कुछ काम शुरू हो जाता है, जिसे दूसरे ने चालित किया।

जो व्यक्ति अपने निर्णय से प्रतिपल नहीं जी रहा है, जिससे दूसरे लोग निर्णय करवा रहे हैं, जिसे दूसरे लोग धक्के दे रहे हैं, मैनिपुलेट कर रहे हैं—ऐसा व्यक्ति मूर्छा में दृढ़ ठहरा हुआ है।

होश में ठहरे हुए व्यक्ति का लक्षण है कि वह स्वयं चल रहा है, स्वयं उठ रहा है और जो भी कर रहा है, वह उसका अपना निर्णय है। उसने उसे सचेतन रूप से लिया है। किसी अचेतन शक्ति ने उससे निर्णय नहीं करवाया है।

चेतन और अचेतन का संघर्ष

आपके भीतर एक बड़ा हिस्सा अचेतन है, जिसका विश्लेषण करने के लिए फ्रायड ने बहुत प्रयास किया। फ्रायड के अनुसार, यदि हम बर्फ के एक टुकड़े को पानी में डाल दें, तो उसका लगभग नौ-दसवाँ हिस्सा पानी में डूबा रहता है और एक हिस्सा ऊपर दिखाई देता है। इसी प्रकार, आपके व्यक्तित्व का एक छोटा-सा हिस्सा ही चेतन है; बहुत बड़ा हिस्सा अचेतन में डूबा हुआ है और उसका आपको कुछ भी पता नहीं है।

मजे की बात यह है कि वे अचेतन हिस्से आपसे चौबीसों घंटे काम करवाते हैं। वे काम आपको करने ही पड़ते हैं। आप निर्णय भी ले लें कि नहीं करूँगा, तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि निर्णय एक हिस्सा लेता है, जबकि उससे कई गुनी ताकत के मनोविचार भीतर दबे पड़े हैं। वे उसकी सुनते भी नहीं।

आप तय कर लेते हैं। ब्रह्मचर्य पर कोई व्याख्यान सुनते हैं, कोई किताब पढ़ते हैं और बात बुद्धि को अच्छी लगती है। वह जो एक हिस्सा पानी के ऊपर तैर रहा है, वह तय कर लेता है। लेकिन वे हिस्से, जो पानी के नीचे दबे हैं, उन्हें आपकी किताब का कोई पता नहीं, ब्रह्मचर्य का कोई पता नहीं। उन्होंने यह बात कभी सुनी ही नहीं। वे अपनी धारणाओं से चल रहे हैं।

वे संस्कार आपके भीतर जन्मों-जन्मों की लंबी यात्रा में एकत्र हुए हैं। अनंत संस्कारों, पशुओं, पौधों और वृक्षों से गुजरते हुए आपने उन्हें इकट्ठा किया है। वे अब भी वहीं हैं। उन्हें कुछ पता भी नहीं है। वे अपने ही ढंग से चलते हैं और उनकी ताकत कहीं अधिक है।

जब भी कामना मन को पकड़ती है, तो वह एक चेतन हिस्सा कमजोर सिद्ध होता है। वे कई गुना ताकतवर अचेतन संस्कार शक्तिशाली सिद्ध होते हैं और आपको मजबूर कर लेते हैं। उनकी मजबूरी इतनी शक्तिशाली होती है कि वे आपके इस चेतन हिस्से को भी तर्क दे देते हैं और यह चेतन हिस्सा भी रैशनलाइज करने लगता है।

वह भी कहता है—छोड़ो, यह सब ब्रह्मचर्य वगैरह में कुछ सार नहीं है। और यह भी कहता है कि यदि ब्रह्मचर्य साधना है, तो जल्दी क्या है? अभी जिंदगी बहुत पड़ी है!

हजार तर्क!

वे अचेतन हिस्से धक्के देकर चेतन हिस्से को राजी करवा लेते हैं। जब वे अपना काम पूरा करवा लेते हैं, तब चेतन हिस्सा फिर अच्छी-अच्छी बातें सोचने लगता है। फिर ब्रह्मचर्य वापस लौटता है। लेकिन यह हमेशा उन शक्तिशाली अचेतन प्रवृत्तियों के मुकाबले कमजोर सिद्ध होता है।

यही प्रत्येक मनुष्य की अड़चन है। जो भी मनुष्य अपने जीवन को बदलने की कोशिश में लगा है, उसकी यह कठिनाई है कि वह तय करता है, लेकिन पूरा नहीं कर पाता।

जागरूकता बढ़े तो अचेतन घटने लगता है

श्रीकृष्ण कहते हैं कि दैवी संपदा तभी सक्रिय होगी, जब कोई व्यक्ति ज्ञानयोग में निरंतर दृढ़ स्थिति में हो। जितना ज्यादा होश सधता है, उतना ही अधिक अचेतन का हिस्सा चेतना के प्रकाश में आने लगता है। जितना ज्यादा आप होश का प्रयोग करते हैं, उतना ही आपका अचेतन कम होने लगता है और चेतन बढ़ने लगता है।

फिर एक ऐसी स्थिति भी आती है—टोटल अवेयरनेस, पूर्ण प्रज्ञा की स्थिति—जब आपका पूरा मन प्रकाशित हो जाता है, होश से भर जाता है।

उस स्थिति में जो भी निर्णय लिए जाते हैं, उनका कोई विरोध नहीं होता। उस स्थिति में जो भी आप तय करते हैं, वह होगा ही, क्योंकि उसके विपरीत आपके भीतर कोई दूसरा स्वर नहीं है।

उस स्थिति में जो भी जीवन है, उसमें कोई पश्चात्ताप नहीं है। उस जीवन में आनंद है और सब कुछ अद्वैत है।

साधना का उद्देश्य है मूर्छा का टूटना

गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद कहते हैं कि सारी साधना की प्रक्रियाएँ ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति के ही उपाय हैं। सारे ध्यान, सारी प्रार्थनाएँ और सारी विधियाँ इसी बात की ओर ले जाती हैं कि आप अधिक से अधिक होश में जीने लगें, मूर्छा टूटे और अमूर्छा बढ़े।

अर्थात् साधना का वास्तविक उद्देश्य केवल किसी विशेष क्रिया को करना नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षण में जागरूक होना है। हम क्या कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं और हमारे भीतर से कौन-सी शक्ति हमें प्रेरित कर रही है—इसका बोध ही चेतना की शुरुआत है।

जब कृत्य चेतन हो जाता है, तब जीवन यंत्रवत् नहीं रहता। तब व्यक्ति परिस्थितियों का गुलाम नहीं होता, बल्कि अपने निर्णयों का स्वामी बनता है।

कृत्य तुम्हारा चेतन हो—यही ज्ञानयोग की सार्थक दिशा है।

इक साल गया, इक साल नया है आने को।
पर वक्त का अब भी होश नहीं दीवाने को।

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