भगवद्गीता वीरों का शास्त्र : स्वामी विवेकानंद

हमेशा अपने संग रखते थे गीता

अपने प्रवचनों में करते थे गीता के श्लोकों का उल्लेख

स्वामी विवेकानंद जयंती पर विशेष

स्वामी विवेकानंद आधुनिक भारत के महान संत और आध्यात्मिक विचारक थे, जिन्होंने अमेरिका में वैदिक सनातन धर्म की गूंज पहुंचाई और पश्चिमी जगत को भारतीय धर्म-दर्शन की सहिष्णुता, गहन चिंतन और ज्ञान से परिचित कराया। उन्होंने दुनिया को यह समझाने का प्रयास किया कि वैदिक सनातन धर्म शांति, सह-अस्तित्व और स्थिरता का एक विश्वसनीय आधार है।

भगवद्गीता के प्रति स्वामी विवेकानंद की विशेष श्रद्धा थी। वे गीता को हमेशा अपने साथ रखते थे और अपने अनेक व्याख्यानों में गीता के श्लोकों तथा उनके संदेशों का उल्लेख करते थे। गीता से जुड़े उनके जीवन के अनेक प्रेरणादायी प्रसंग हैं। आज ऐसे ही कुछ प्रसंगों और उनके विचारों की चर्चा करते हैं।

‘पहले छह माह फुटबॉल खेलो, फिर गीता पढ़ना’

एक दिन एक युवक स्वामी विवेकानंद के पास आया। उसने कहा, “मैं आपसे गीता पढ़ना चाहता हूँ।”

स्वामीजी ने युवक को ध्यान से देखा और कहा, “पहले छह माह प्रतिदिन फुटबॉल खेलो, फिर आना। तब मैं तुम्हें गीता पढ़ाऊँगा।”

युवक आश्चर्य में पड़ गया। गीता जैसे पवित्र ग्रंथ के अध्ययन के बीच फुटबॉल कहाँ से आ गया? इसका क्या संबंध है?

युवक की चकित अवस्था को देखकर स्वामीजी ने समझाया, “बेटा! भगवद्गीता वीरों का शास्त्र है। यह एक सेनानी द्वारा एक महारथी को दिया गया दिव्य उपदेश है। अतः पहले शरीर का बल बढ़ाओ। शरीर स्वस्थ होगा तो बुद्धि भी परिष्कृत होगी और तुम गीता जैसे गहन विषय को आसानी से समझ सकोगे।”

जो व्यक्ति अपने शरीर को स्वस्थ, सशक्त और सजग नहीं रख सकता, अर्थात् जो अपने शरीर को ही नहीं संभाल पाया, वह गीता के विचारों और अध्यात्म को कैसे संभाल सकेगा? उन्हें अपने जीवन में कैसे उतार पाएगा? गीता के गूढ़ संदेश को आत्मसात करने के लिए स्वस्थ शरीर के साथ स्वस्थ और एकाग्र मन भी आवश्यक है।

प्रवचनों और पत्रों में गीता के श्लोक

स्वामी विवेकानंद अपने प्रवचनों और पत्रों में अक्सर भगवद्गीता के श्लोकों का उल्लेख करते थे। उनके विचारों में गीता के कर्मयोग, ज्ञानयोग, वैराग्य और आत्मसंयम का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।

हेल बहनों को लिखे पत्र में गीता का श्लोक

26 जून 1894 को हेल बहनों—सुश्री मैरी हेल और एच. हेल—को लिखे एक पत्र में स्वामी विवेकानंद ने भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक 69 को उद्धृत किया—

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥

उन्होंने इस श्लोक का भाव स्पष्ट करते हुए लिखा कि जहाँ सामान्य संसार जाग रहा होता है, वहाँ संयमी व्यक्ति सोया हुआ-सा रहता है और जहाँ संसार सोया हुआ है, वहाँ ज्ञानी व्यक्ति जाग्रत रहता है।

उनके पत्रों में सांसारिक मोह से ऊपर उठने, आत्मसंयम रखने और आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने का संदेश बार-बार दिखाई देता है। वे मनुष्य को संसार की क्षणभंगुरता से ऊपर उठकर अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने के लिए प्रेरित करते थे।

उन्होंने लिखा कि दुनिया की धूल भी आपको कभी न छुए। उन्होंने मनुष्य को सांसारिक आकर्षण और भ्रष्ट वातावरण से ऊपर उठने तथा आध्यात्मिक ऊंचाइयों की ओर बढ़ने का आह्वान किया।

कर्मयोग पर स्वामी विवेकानंद की दृष्टि

23 जुलाई 1895 को थाउजेंड आइलैंड पार्क में दिए गए अपने कर्मयोग संबंधी व्याख्यान में स्वामी विवेकानंद ने निष्काम कर्म के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।

उन्होंने कहा कि कर्म से मुक्ति पाने के लिए कर्म से भागना नहीं, बल्कि कर्म में पूरी तरह प्रवृत्त होना चाहिए—लेकिन बिना किसी स्वार्थ और फल की इच्छा के। ऐसा कर्म व्यक्ति को ज्ञान की ओर ले जाता है और ज्ञान अंततः मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।

उनका संदेश था कि आत्मा के लिए किया गया कर्म बंधन का कारण नहीं बनता। न सुख की इच्छा करनी चाहिए और न कर्म से उत्पन्न होने वाले दुख से डरना चाहिए। मन और शरीर अपने-अपने कार्य करते हैं; साधक को स्वयं को उस कर्म का अहंकारी कर्ता नहीं मानना चाहिए।

स्वामी विवेकानंद बार-बार इस भाव को आत्मसात करने की प्रेरणा देते थे कि अपने सभी कर्म भगवान को अर्पित करके किए जाएँ। संसार में रहते हुए भी संसार की आसक्ति से मुक्त रहा जाए—ठीक उसी प्रकार जैसे कमल का पत्ता जल में रहते हुए भी जल से निर्लिप्त रहता है।

वे सभी के प्रति प्रेम रखने की प्रेरणा देते थे, चाहे सामने वाला व्यक्ति हमारे साथ कैसा भी व्यवहार करे। उनके अनुसार हम संसार में जो बुराई देखते हैं, उसका संबंध हमारे अपने भीतर से भी होता है। यदि हमारा अंतःकरण शुद्ध है, तो हम अशुद्धता को उसी दृष्टि से नहीं देखेंगे।

उनका स्पष्ट संदेश था—संसार की वस्तुओं के पीछे भागने के बजाय भगवान को खोजो। उन्होंने कहा कि हमें सृष्टि के पीछे सृष्टिकर्ता को जानने का प्रयास करना चाहिए।

इसी संदर्भ में उन्होंने भगवद्गीता के मनोनिग्रह संबंधी श्लोक को भी उद्धृत किया—

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥

— भगवद्गीता, 6.35

अर्थात् हे महाबाहो! निस्संदेह मन अत्यंत चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है, लेकिन अभ्यास और वैराग्य के द्वारा इसे नियंत्रित किया जा सकता है।

ज्ञान की पवित्रता और आत्मसाक्षात्कार

3 जुलाई 1897 को स्वामी विवेकानंद ने अपने शिष्य शरत चंद्र चक्रवर्ती को अल्मोड़ा से एक पत्र लिखा। यह उनके द्वारा संस्कृत भाषा में लिखे गए कुछ पत्रों में से एक माना जाता है। उस पत्र में उन्होंने भगवद्गीता के श्लोक 4.38 को उद्धृत किया—

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥

— भगवद्गीता, 4.38

इस श्लोक का भाव है कि इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला दूसरा कुछ नहीं है। योग में सिद्ध हुआ व्यक्ति समय के साथ उस ज्ञान को अपने भीतर ही अनुभव करता है।

स्वामी विवेकानंद ने इसी भावभूमि पर वैराग्य और आत्मज्ञान की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विपत्ति सच्चे ज्ञान की कसौटी है। सत्य के संबंध में यह बात बार-बार कही जा सकती है कि मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना चाहिए।

उन्होंने लिखा कि वैराग्य ही सांसारिक रोग का सच्चा निदान है। जिस व्यक्ति में वैराग्य का यह भाव विकसित हो गया है, उसका जीवन धन्य है।

उन्होंने प्रेरक रूपक का प्रयोग करते हुए कहा कि यदि कोई नाव चलाते-चलाते थक गया है, तो कुछ समय के लिए अपनी पतवारों को विश्राम दे। नाव की गति उसे दूसरे किनारे तक पहुंचा देगी। अर्थात् साधक को धैर्य बनाए रखना चाहिए और अपनी आध्यात्मिक यात्रा पर विश्वास रखना चाहिए।

गीता के श्लोक 4.38 का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि समय आने पर और योग में पूर्णता प्राप्त करने पर साधक अपने हृदय में उस परम तत्व को अनुभव करता है।

उपनिषदों के त्याग संबंधी संदेश का उल्लेख करते हुए उन्होंने यह भी बताया कि अमरत्व की प्राप्ति भौतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि त्याग और आत्मज्ञान से होती है।

‘कृष्ण को समझना है तो पहले गीता को समझिए’

स्वामी विवेकानंद का गीता के प्रति गहरा सम्मान उनके इस विचार से भी स्पष्ट होता है कि कृष्ण को समझने के लिए उनकी शिक्षा को समझना आवश्यक है। उनके अनुसार श्रीकृष्ण केवल गीता के उपदेशक नहीं थे, बल्कि उन्होंने अपने जीवन में गीता के संदेश को मूर्त रूप दिया।

स्वामी विवेकानंद के शब्दों में, कृष्ण अपने पूरे जीवन में उस दिव्य गीत के मूर्त रूप थे। वे वैराग्य, कर्म, ज्ञान और लोककल्याण के महान उदाहरण थे।

इसलिए स्वामी विवेकानंद के लिए भगवद्गीता केवल पढ़ने का ग्रंथ नहीं थी। वह जीवन जीने की कला, कर्म करने की प्रेरणा, आत्मबल जगाने का साधन और मनुष्य को निर्भीक बनाने वाला आध्यात्मिक मार्गदर्शन थी।

यही कारण है कि उनके जीवन और विचारों में गीता बार-बार दिखाई देती है। वे गीता के संदेश को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि जीवन में उतारने की प्रेरणा देते थे।

भगवद्गीता वीरों का शास्त्र है—क्योंकि यह मनुष्य को भय से मुक्त होकर अपने कर्तव्य के मार्ग पर दृढ़ता से चलना सिखाती है।

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