मानसिक स्वास्थ्य की अचूक ‘थेरेपी’ है गीता
गीता ऐसा दिव्य ग्रंथ है, जो मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य के लगभग सभी पहलुओं पर गहन प्रकाश डालता है। यदि कोई व्यक्ति मानसिक तनाव से ग्रस्त है, तो गीता उसके तनाव को दूर करने में अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो सकती है। विषाद, अवसाद, दुःख, संताप, अज्ञात भय अथवा असुरक्षा की भावना जैसी मानसिक अवस्थाओं में गीता अंधकार में दीपक की भाँति मार्गदर्शन करती है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहा करते थे कि जब भी वे किसी मानसिक द्वंद्व या निराशा से घिरते थे, तब वे भगवद्गीता का आश्रय लेते थे। उनका विश्वास था कि गीता प्रत्येक प्रश्न का समाधान प्रदान करती है।
गीता में वर्णन है कि जीवन के सबसे बड़े युद्ध के समय अर्जुन मानसिक रूप से हताश, उदास, निराश और भ्रमित हो गए थे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनके मोह का नाश किया, उन्हें विषाद और अवसाद की अवस्था से बाहर निकालकर पुनः उनके कर्तव्य-पथ पर स्थापित किया। यही गीता का मानसिक स्वास्थ्य संबंधी पहला संदेश है—अपने कर्तव्य का पालन करो।
गीता कहती है कि व्यक्ति को अपने स्वभाव और अपने कर्तव्य के साथ सहज होना चाहिए। वास्तव में गीता हमें अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करने और अपने मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥ (गीता 3.35)
अर्थात्, दोषयुक्त होने पर भी अपना स्वधर्म, दूसरे के उत्तम प्रकार से किए गए धर्म से श्रेष्ठ है। अपने कर्तव्य का पालन करते हुए जीवन समाप्त हो जाना भी श्रेयस्कर है, क्योंकि परधर्म भय उत्पन्न करने वाला है।
इसलिए अपने कर्तव्यों की उपेक्षा न करें, अन्यथा अंततः केवल असंतोष ही प्राप्त होगा। किसी और का जीवन जीने का प्रयास न करें। आपका जीवन आपका अपना है; उसका सम्मान करना सीखिए। जब आप अपने स्वभाव और कर्तव्य के अनुरूप जीवन जीते हैं, तभी वास्तविक सफलता और संतोष प्राप्त होता है।
जीवन में सफलता पाने के लिए केवल गंतव्य पर नहीं, बल्कि यात्रा पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है। ज्ञान से आत्मा का बोध होता है, भक्ति से परमात्मा का अनुभव होता है, किंतु कर्मयोग के माध्यम से आत्मा और परमात्मा दोनों का साक्षात्कार संभव है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कर्म करना ही मनुष्य का धर्म है; बिना कर्म के कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसलिए हमारा ध्यान सदैव अपने लक्ष्य और कर्तव्य पर होना चाहिए। यह दृष्टिकोण मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाता है।
दूसरा कदम—संयम
गीता यह भी सिखाती है कि व्यक्ति को अपना जीवन संयमपूर्वक जीना चाहिए। वाणी, आहार, निद्रा और व्यवहार—सभी में संतुलन आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन अत्यधिक काम करे और फिर सप्ताहांत में अत्यधिक व्यायाम करके उसकी भरपाई करना चाहे, तो यह संतुलित जीवन नहीं है।
अपने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए नियमित रूप से व्यायाम करें, पर्याप्त नींद लें, संतुलित भोजन करें और आवश्यकता से अधिक कार्य करने से बचें। इससे उपलब्धि, संतोष और प्रसन्नता का अनुभव होगा।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥ (गीता 6.17)
अर्थात्, जो व्यक्ति आहार-विहार, कर्म, सोने और जागने में संयम रखता है, उसका योग सभी दुःखों का नाश करता है।
तीसरा कदम—मन को नियंत्रित रखें
मानसिक स्वास्थ्य के लिए मन का संयम अत्यंत आवश्यक है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि मन अत्यंत चंचल है। वह बालक की भाँति हर वस्तु की ओर आकर्षित होता है।
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥ (गीता 6.35)
अर्थात्, हे महाबाहु अर्जुन! निःसंदेह मन चंचल और कठिनाई से वश में आने वाला है, परंतु अभ्यास और वैराग्य के द्वारा उसे नियंत्रित किया जा सकता है।
बुद्धि, विवेक और आध्यात्मिक शक्ति के माध्यम से मन को संयमित किया जा सकता है। मानसिक स्वास्थ्य मूलतः मन की अवस्था है। निरंतर अभ्यास और वैराग्य से इसे स्वस्थ एवं स्थिर बनाया जा सकता है। जब भी मन भटके, उसे प्रेमपूर्वक पुनः वर्तमान और अपने लक्ष्य की ओर ले आएँ। यही अभ्यास मन और शरीर दोनों को स्वस्थ बनाए रखने में सहायक होता है।
श्रीकृष्ण यह भी सिखाते हैं कि बीते हुए कल पर पश्चाताप और आने वाले कल की अनावश्यक चिंता करने के स्थान पर वर्तमान में जीना चाहिए। वर्तमान क्षण ही जीवन का वास्तविक सत्य है।
चौथा कदम—ध्यान
मानसिक स्वास्थ्य के लिए गीता ध्यान पर विशेष बल देती है। गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद के अनुसार, ध्यान मनुष्य को आंतरिक शांति और सद्भाव प्राप्त करने में सहायता करता है।
ध्यान मन को एकाग्र करता है, इंद्रियों को संयमित करता है और भीतर की अशांति को शांत करता है। दृढ़ संकल्प और निरंतर अभ्यास के साथ ध्यान करने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे स्वार्थपूर्ण इच्छाओं और अनावश्यक अपेक्षाओं से मुक्त होने लगता है। उसकी इच्छाशक्ति सुदृढ़ होती है और मन अधिक स्थिर बनता है।
ध्यान एक ऐसी प्रक्रिया है जो मानसिक पटल को निर्मल और स्वस्थ बनाती है। यह सकारात्मक विचारों को जन्म देता है, मानसिक शांति प्रदान करता है और व्यक्ति को संतुलित, प्रसन्न तथा स्वस्थ जीवन जीने की प्रेरणा देता है। इसलिए गीता के अनुसार, ध्यान मानसिक स्वास्थ्य की सबसे प्रभावी साधनाओं में से एक है।
