अनासक्ति विरक्ति नहीं है
अक्सर लोग अनासक्ति का अर्थ विरक्ति समझ लेते हैं, जबकि अनासक्ति विरक्ति नहीं है। वास्तव में विरक्ति भी एक प्रकार की आसक्ति है। विरक्ति, विपरीत दिशा की आसक्ति है। कोई व्यक्ति काम में आसक्त है, तो कोई काम के विपरीत ब्रह्मचर्य में आसक्त है। कोई धन में आसक्त है, तो कोई धन-त्याग में। कोई शरीर के श्रृंगार में आसक्त है, तो कोई शरीर को कुरूप बनाने में। यद्यपि धन का त्याग करने वाला या शरीर को कुरूप बनाने वाला व्यक्ति विरक्त दिखाई देता है, किन्तु उसकी आसक्ति केवल नकारात्मक (Negative) रूप ले चुकी होती है।
आसक्ति के दो रूप हैं—किसी के पक्ष में आसक्त होना और किसी के विपक्ष में आसक्त होना। जो विपक्ष में आसक्त है, वह भी उतना ही आसक्त है जितना पक्ष में आसक्त व्यक्ति। अनासक्ति इन दोनों प्रकार की आसक्तियों से मुक्ति का नाम है। अनासक्ति का अर्थ है—न आसक्ति, न विरक्ति; बल्कि इन दोनों का अतिक्रमण।
‘अनासक्ति’ उन दुर्भाग्यपूर्ण शब्दों में से एक है जिसे सबसे कम समझा गया है। समय के साथ इसे ‘विरक्ति’ का पर्याय मान लिया गया। इसी प्रकार वीतराग शब्द के साथ भी भ्रम हुआ। वीतराग का अर्थ विराग नहीं है। वीतराग का वास्तविक अर्थ है—राग और विराग, दोनों के पार होना।
महावीर ने जिस अवस्था को वीतराग कहा, उसी को श्रीकृष्ण ने अनासक्ति कहा। अनासक्ति और वीतरागता लक्ष्य की दृष्टि से पर्याय हैं, किन्तु उनके मार्ग भिन्न हैं। महावीर राग और विराग—दोनों का त्याग करके वीतराग हुए, जबकि श्रीकृष्ण दोनों को स्वीकार करते हुए अनासक्त रहे। इसलिए दोनों की परिणति एक ही है, परंतु साधना-पथ अलग है।
वीतराग का अर्थ है—जिसने राग भी छोड़ा और विराग भी छोड़ा; यहाँ त्याग पर बल है। अनासक्ति का अर्थ है—जिसने राग और विराग दोनों को स्वीकार किया, पर उनमें बंधा नहीं; यहाँ स्वीकार पर बल है। इस दृष्टि से वीतराग शब्द अधिक निषेधात्मक (Negative) है, जबकि अनासक्ति विधेयात्मक (Positive) है।
अनासक्त चित्त वह है जिसने जीवन को जैसा है वैसा ही स्वीकार कर लिया है। ऐसे व्यक्ति के चित्त पर किसी भी अनुभव की रेखा नहीं छूटती। हम किसी वस्तु को जोर से पकड़ें, तब भी चित्त पर छाप पड़ती है; और उसे जोर से छोड़ें, तब भी छाप पड़ती है। किन्तु न पकड़ें, न छोड़ें—तब चित्त पर कोई रेखा नहीं बनती। यही अनासक्त चित्त है।
इसे समझने के लिए स्वामी विवेकानन्द के जीवन का एक प्रेरक प्रसंग उल्लेखनीय है। जब स्वामी विवेकानन्द खेतड़ी से जयपुर आए, तब खेतड़ी नरेश उन्हें विदा करने के लिए जयपुर तक साथ आए। संध्या समय मनोरंजनार्थ नृत्य और गायन का कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसके लिए एक प्रसिद्ध नर्तकी को आमंत्रित किया गया था।
जब स्वामी विवेकानन्द से कार्यक्रम में सम्मिलित होने का आग्रह किया गया, तो उन्होंने यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि संन्यासी का नृत्य-गायन में उपस्थित होना उचित नहीं है।
जब नर्तकी को इसका पता चला, तो वह अत्यंत दुखी हुई। उसे लगा कि क्या वह इतनी घृणा की पात्र है कि एक संन्यासी उसकी उपस्थिति में कुछ क्षण भी नहीं बैठ सकता? व्यथित होकर उसने सूरदास का प्रसिद्ध भजन गाना प्रारम्भ किया—
“प्रभु मोरे अवगुण चित्त न धरो, समदर्शी है नाम तिहारो…
एक लोहा पूजा में राखत, एक घर बधिक परो।
सो दुविधा पारस नहीं देखत, कंचन करत खरो॥”
भजन के शब्द स्वामी विवेकानन्द के हृदय को स्पर्श कर गए। उन्होंने नर्तकी की पीड़ा को समझा, उसके पास जाकर क्षमा माँगी और उसे अपनी ज्ञानमयी माँ कहा।
इस घटना के बाद उनके भीतर समत्व और अनासक्ति की भावना और अधिक प्रबल हुई। बाद में जब किसी ने दक्षिणेश्वर मंदिर के उत्सव में वेश्याओं के प्रवेश पर आपत्ति की, तब स्वामीजी ने कहा—
“यदि वेश्याएँ दक्षिणेश्वर नहीं जाएँगी, तो फिर कहाँ जाएँगी?”
उन्होंने कहा कि प्रभु के लिए जाति, धर्म, लिंग या सामाजिक स्थिति का कोई भेद नहीं है। ईश्वर तो गिरे हुए को उठाने वाला है। इसलिए वे प्रार्थना करते थे कि प्रभु के चरणों में चोर, डाकू, शराबी, वेश्याएँ—सभी आएँ, ताकि सबका उद्धार हो और समाज वास्तविक अर्थों में प्रगति कर सके।
ईश्वर ने सभी मनुष्यों को समान बनाया है। जब उसकी दृष्टि में कोई भेदभाव नहीं है, तो उसकी सृष्टि में भी परस्पर भेदभाव नहीं होना चाहिए।
स्वामी ज्ञानानन्द कहते हैं कि अनासक्ति हमारा स्वभाव है। क्योंकि अनासक्ति हमारा स्वभाव है, इसलिए हम आसक्त भी हो सकते हैं और विरक्त भी। यदि आसक्ति ही हमारा स्वभाव होती, तो हम कभी विरक्त नहीं हो सकते थे। और यदि विरक्ति हमारा स्वभाव होती, तो हम कभी आसक्त नहीं हो सकते थे।
इसे एक वृक्ष की शाखा से समझा जा सकता है। जब हवा पश्चिम की ओर चलती है, तो शाखा पश्चिम की ओर झुक जाती है। जब हवा पूर्व की ओर चलती है, तो वही शाखा पूर्व की ओर झुक जाती है। ऐसा इसलिए संभव है क्योंकि शाखा का स्वभाव न पूर्व है, न पश्चिम; वह मध्य में स्थित है। हवा जिधर चलती है, वह उधर झुक जाती है।
इसी प्रकार हम आँखें खोल सकते हैं और बंद भी कर सकते हैं, क्योंकि आँख का स्वभाव न खुला रहना है और न बंद रहना। यदि उसका स्वभाव केवल खुला रहना होता, तो वह कभी बंद नहीं हो सकती थी; और यदि बंद रहना होता, तो कभी खुल नहीं सकती थी। वास्तव में खुलना और बंद होना केवल पलकों की क्रिया है। चेतना न खुलती है, न बंद होती है।
ठीक इसी प्रकार हमारी चेतना मूलतः अनासक्त है। आसक्ति और विरक्ति केवल मन की अवस्थाएँ हैं, चेतना का स्वभाव नहीं। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि अनासक्ति ही हमारा वास्तविक स्वभाव है। जो हमारा स्वभाव है, वही प्राप्त किया जा सकता है; जो हमारा स्वभाव नहीं है, उसे कभी स्थायी रूप से प्राप्त नहीं किया जा सकता।
एक बीज फूल बन जाता है क्योंकि उसके भीतर फूल बनने की संभावना पहले से विद्यमान होती है। किन्तु एक पत्थर कभी फूल नहीं बन सकता, क्योंकि उसके स्वभाव में फूल बनने की संभावना ही नहीं है। उसी प्रकार अनासक्ति हमारे भीतर पहले से विद्यमान है; उसे केवल पहचानने और प्रकट करने की आवश्यकता है।
