भावनात्मक बुद्धिमत्ता का सजीव कोश है गीता।

भाग–4 : सामाजिक जागरूकता

सामाजिक जागरूकता सामाजिक परिस्थितियों को समझने और उनसे प्रभावी ढंग से निपटने की क्षमता है। इसमें दूसरों की आवश्यकताओं, भावनाओं और दृष्टिकोण को पहचानना तथा उनके अनुरूप संवेदनशील व्यवहार करना शामिल है। सामाजिक संकेतों को समझना, सांस्कृतिक मानदंडों का सम्मान करना तथा अपने आसपास के लोगों के प्रति सहानुभूति रखना सामाजिक जागरूकता के प्रमुख आयाम हैं।

भगवान श्रीकृष्ण सामाजिक गतिशीलता और विभिन्न समूहों की आवश्यकताओं के प्रति अत्यंत सजग थे। महाभारत में उन्होंने पाण्डवों के साथ हो रहे अन्याय को पहचाना और धर्म की स्थापना के लिए उनका साथ दिया। साथ ही, उन्होंने युद्ध से प्रभावित होने वाले असंख्य लोगों के प्रति करुणा प्रकट की और अंतिम क्षण तक युद्ध को टालने का प्रयास किया।

श्रीकृष्ण के जीवन में सामाजिक जागरूकता के अनेक उदाहरण मिलते हैं। जब वे पाण्डवों और कौरवों के बीच शांति-दूत बनकर हस्तिनापुर गए, तब उन्होंने जटिल सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को गहराई से समझते हुए दोनों पक्षों के हितों का संतुलन बनाने का प्रयास किया। वे भली-भाँति जानते थे कि यदि युद्ध टाला न गया, तो उसका परिणाम भीषण विनाश होगा। इसलिए उन्होंने दुर्योधन को अनेक प्रकार से समझाया।

किन्तु जब दुर्योधन ने अहंकारवश कहा—

“सूच्यग्रं नैव दास्यामि विना युद्धेन केशव।”

अर्थात् “हे केशव! मैं बिना युद्ध के सुई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं दूँगा।” तब श्रीकृष्ण ने समझ लिया कि शांति का मार्ग अब बंद हो चुका है। दुर्योधन ने उन्हें बंदी बनाने का भी प्रयास किया। उस समय भगवान ने अपना विराट स्वरूप प्रकट कर उसे अपनी दिव्य शक्ति तथा युद्ध के भीषण परिणामों का दर्शन कराया। इसके साथ ही यह स्पष्ट कर दिया कि अब विनती का समय समाप्त हो चुका है और धर्म की रक्षा के लिए युद्ध ही एकमात्र उपाय है।

इसी भावना को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने इन पंक्तियों में व्यक्त किया है—

“याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।”

श्रीकृष्ण की सामाजिक जागरूकता केवल राजनीति और युद्ध तक सीमित नहीं थी। वे लोगों की भावनाओं को गहराई से समझते थे और उनके अनुरूप प्रेम, करुणा तथा संवेदनशीलता से व्यवहार करते थे। वृन्दावन की गोपियों के विरह को उन्होंने आत्मीयता से अनुभव किया और उनके प्रेम का सदैव सम्मान किया। वे सामाजिक स्थिति नहीं, बल्कि भावनाओं का मूल्य समझते थे।

इसी प्रकार वे सांस्कृतिक परम्पराओं और सामाजिक मर्यादाओं का भी पूरा सम्मान करते थे। जब उनके बालसखा सुदामा द्वारका पहुँचे, तब भगवान ने राजवैभव का त्याग कर उन्हें अत्यंत आदरपूर्वक अपने हृदय से लगाया। उनके चरण धोए, उन्हें सिंहासन पर बैठाया और आत्मीय सत्कार किया। इससे यह संदेश मिलता है कि सच्चे संबंध धन-दौलत से नहीं, बल्कि प्रेम और सम्मान से बनते हैं।

ऐसा ही एक मार्मिक प्रसंग महात्मा विदुर के घर का है। भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के राजमहलों का आतिथ्य स्वीकार करने के बजाय भक्त विदुर के साधारण गृह में जाना उचित समझा। जब विदुरानी ने श्रीकृष्ण के आगमन का समाचार सुना, तो वे प्रेमविभोर होकर अपनी सुध-बुध खो बैठीं। भगवान ने उनकी लज्जा की रक्षा करते हुए अपना पीताम्बर उन्हें ओढ़ा दिया। प्रेमावेश में विदुरानी ने केले छीलते समय भूलवश फल फेंक दिए और छिलके ही भगवान को खिलाने लगीं। भगवान भी प्रेमपूर्वक उन्हें ग्रहण करते रहे।

जब विदुर ने यह देखा, तो उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया। तब श्रीकृष्ण मुस्कराकर बोले कि उन्हें उन छिलकों में अधिक आनंद मिल रहा था, क्योंकि उनमें निष्कपट प्रेम और समर्पण का स्वाद था। उस रात्रि भगवान विदुर के घर ही ठहरे और साधारण सरसों का साग उसी आनंद से ग्रहण किया, मानो छप्पन भोग का प्रसाद हो।

स्वामी ज्ञानानन्द जी कहते हैं कि यह प्रसंग एक गहन आध्यात्मिक सत्य का उद्घाटन करता है—भगवान बाहरी वैभव नहीं, बल्कि भक्त के निष्कलुष प्रेम और समर्पण को स्वीकार करते हैं। यही संदेश भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता (अध्याय 9, श्लोक 26) में दिया है—

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥

अर्थात् जो भक्त मुझे प्रेमपूर्वक पत्र, पुष्प, फल अथवा जल भी अर्पित करता है, मैं उस श्रद्धा और भक्ति से अर्पित उपहार को सहर्ष स्वीकार करता हूँ।

भगवान को न पद प्रभावित करता है, न धन और न प्रतिष्ठा। यदि उन्हें कुछ आकर्षित करता है, तो वह है मनुष्य का निष्कपट भाव, प्रेम और समर्पण। यही कारण है कि श्रीमद्भगवद्गीता केवल आध्यात्मिक ग्रंथ ही नहीं, बल्कि भावनाओं को समझने, नियंत्रित करने और समाज के कल्याण में उनका सदुपयोग करने की दिव्य मार्गदर्शिका भी है।

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