भावनात्मक बुद्धिमत्ता का सजीव कोश है भगवद्गीता।भाग–5 : अनुकूलन क्षमता

भाग–5 : अनुकूलन क्षमता

2022 में नियोक्ताओं द्वारा सर्वाधिक महत्त्व दिए जाने वाले शीर्ष पाँच सॉफ्ट स्किल्स में अनुकूलन क्षमता (Adaptability) भी शामिल थी।

कार्यस्थल पर अनुकूलन क्षमता का वास्तविक अर्थ क्या है, और आप नियोक्ताओं को यह कैसे दिखा सकते हैं कि आपके भीतर वह अनुकूलनशीलता है जिसकी उन्हें आवश्यकता है? भगवद्गीता का संदेश और भगवान श्रीकृष्ण का जीवन इस कौशल के विकास में अत्यंत प्रेरणादायक एवं मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं।

अनुकूलन क्षमता का अर्थ है बदलती परिस्थितियों, परिवेश और चुनौतियों के अनुरूप स्वयं को ढालना तथा उनमें सफलतापूर्वक आगे बढ़ना। इसमें लचीलापन, खुले विचार, नवाचार को स्वीकार करने की प्रवृत्ति तथा नई परिस्थितियों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण शामिल होता है। यह एक महत्त्वपूर्ण सॉफ्ट स्किल है, जो व्यक्ति को परिवर्तित परिस्थितियों के साथ सहजता से तालमेल बैठाने में सक्षम बनाती है।

कार्यस्थल पर अनुकूलनशील व्यक्ति बदलती प्राथमिकताओं, परियोजनाओं, ग्राहकों और नई प्रौद्योगिकियों के अनुरूप स्वयं को शीघ्र ढाल लेता है। वह प्रक्रियाओं में होने वाले परिवर्तनों तथा कार्य-परिवेश की नई आवश्यकताओं का प्रभावी ढंग से सामना कर सकता है।

भगवान श्रीकृष्ण अनुकूलन क्षमता के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। महाभारत में उन्होंने पाण्डवों को धर्म की स्थापना और विजय दिलाने के लिए समय, परिस्थिति और आवश्यकता के अनुसार विभिन्न नीतियों, रणनीतियों और युक्तियों का प्रयोग किया। वे प्रत्येक व्यक्ति के स्वभाव, पात्रता और आवश्यकता के अनुरूप अपने विचार, व्यवहार और संवाद शैली को परिवर्तित करते थे।

श्रीकृष्ण के संपूर्ण जीवन में अनुकूलन क्षमता के अनेक उदाहरण मिलते हैं। बाल्यकाल में वे ग्वालबालों के साथ एक सरल गोपाल के रूप में रहे; वृन्दावन में प्रेम और माधुर्य के प्रतीक बने; मथुरा में अत्याचारी कंस का अंत किया; द्वारका में एक कुशल शासक बने; हस्तिनापुर में शांति-दूत की भूमिका निभाई; कुरुक्षेत्र में अर्जुन के सारथी, उपदेशक, कूटनीतिज्ञ और रणनीतिकार बने। प्रत्येक भूमिका में उन्होंने समय और परिस्थिति के अनुरूप अपने आचरण, संवाद और निर्णयों को ढाला तथा उस भूमिका की अपेक्षाओं को उत्कृष्ट रूप से पूरा किया।

उनकी अनुकूलन क्षमता विभिन्न प्रकार के लोगों के साथ उनके व्यवहार में भी स्पष्ट दिखाई देती है। वे राजाओं, योद्धाओं, ऋषियों, ग्वालों, मित्रों और सामान्य जन—सभी से समान सहजता से जुड़ते थे। वे प्रत्येक व्यक्ति की समझ, परिस्थिति और मानसिकता के अनुसार अपनी भाषा और संदेश को इस प्रकार प्रस्तुत करते थे कि वह उसके हृदय तक पहुँच सके। यही कारण है कि वे केवल उपदेशक नहीं, बल्कि श्रेष्ठ संवादक भी थे।

इसके अतिरिक्त, भगवद्गीता में भी श्रीकृष्ण परिवर्तन को जीवन का स्वाभाविक नियम बताते हैं। वे सिखाते हैं कि परिवर्तन का विरोध करने या उससे भयभीत होने के बजाय उसे स्वीकार कर उसके अनुरूप स्वयं को विकसित करना ही बुद्धिमत्ता है। जो व्यक्ति परिवर्तन के साथ स्वयं को ढाल लेता है, वही जीवन में निरंतर प्रगति करता है।

भगवद्गीता (अध्याय 2, श्लोक 27) में भगवान कहते हैं—

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

अर्थ : जो जन्म ले चुका है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मर चुका है उसका पुनर्जन्म भी निश्चित है। इसलिए जो अपरिहार्य है, उसके लिए शोक करना उचित नहीं है।

गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द जी कहते हैं कि परिवर्तन संसार का शाश्वत नियम है। इसलिए प्रत्येक क्षेत्र में ऐसे लोगों की आवश्यकता होती है जो परिवर्तन के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया देना जानते हों। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम स्वयं को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप तैयार करें। भविष्य का अनुमान सदैव संभव नहीं होता, जैसा कि कोविड-19 महामारी के समय पूरी दुनिया ने अनुभव किया। परन्तु जो व्यक्ति उत्तरदायी, सहयोगी, सहानुभूतिपूर्ण और निरंतर सीखने के लिए तत्पर रहता है, वही कठिन परिस्थितियों में भी सफलता प्राप्त करता है। वर्तमान और भविष्य दोनों ही अनुकूलनशील व्यक्तियों के हैं।

इसी भावना को निम्न पंक्तियाँ अत्यंत सुंदर ढंग से व्यक्त करती हैं—

मेहनत से उठा हूँ, आपकी मेहनत का दर्द जानता हूँ,
आसमान से कहीं अधिक ज़मीं की कद्र जानता हूँ।
“अनुकूलनशील” पेड़ था आपका, जो झेल गया आँधियाँ,
मैं तो उन मगरूर दरख़्तों का हश्र जानता हूँ।

अब विचार करने योग्य प्रश्न यह है कि महाभारत में कौन-सा पक्ष अनुकूलनशील वृक्ष की भाँति था और कौन अहंकार से भरे कठोर वृक्ष के समान? इसका उत्तर प्रत्येक पाठक स्वयं खोज सकता है। यदि हम समय, परिस्थिति और सत्य के अनुरूप स्वयं में सहज, सकारात्मक और विवेकपूर्ण परिवर्तन लाने का साहस विकसित करें, तो यही भगवद्गीता की अनुकूलन क्षमता संबंधी शिक्षा का वास्तविक पालन होगा।

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