कार्य के प्रति समर्पण एवं कार्यकुशलता की मानसिक क्रांति का उद्घोष करती है गीता
आज विश्व के वही देश समृद्धि के शिखर पर हैं, जो अपने व्यावसायिक उपक्रमों का कुशल प्रबंधन कर रहे हैं। महाभारत के युद्ध में डेढ़ गुना से भी अधिक विशाल कौरव सेना तथा भीष्म, कृपाचार्य, द्रोण, कर्ण और अश्वत्थामा जैसे अजेय योद्धाओं पर विजय प्राप्त करने के लिए अर्जुन को एकनिष्ठ लक्ष्य, दृढ़ संकल्प और कर्तव्यनिष्ठा का संदेश देने वाली भगवद्गीता आज के प्रतिस्पर्धी एवं चुनौतीपूर्ण व्यावसायिक प्रबंधन में भी उतनी ही उपयोगी और कारगर सिद्ध होती है।
विश्व के कुल औद्योगिक उत्पादन का बड़ा भाग कुछ ही विकसित देशों के नियंत्रण में है। इसका प्रमुख कारण उनका प्रभावी आर्थिक, औद्योगिक, व्यापारिक एवं प्रबंधन तंत्र है। भारत वर्तमान में विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और वैश्विक उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। ऐसे समय में यदि भारत को विकसित राष्ट्र के रूप में स्थापित होना है, तो समाज और संस्थानों के प्रत्येक स्तर पर उच्च लक्ष्य निर्धारित कर कर्तव्य-पथ पर समर्पित होने की आवश्यकता है। इस दिशा में श्रीमद्भगवद्गीता का मार्गदर्शन अत्यंत प्रासंगिक है।
आधुनिक प्रबंधन विद्वानों के अनुसार, प्रबंधन वह कला है जिसके माध्यम से लोगों से सर्वोत्तम कार्य उचित संसाधनों और न्यूनतम लागत में कराया जाता है। किसी भी प्रबंधन प्रणाली का सबसे महत्वपूर्ण घटक मनुष्य होता है। यही संदेश गीता के प्रसिद्ध सूत्र—
“योगः कर्मसु कौशलम्।”
में निहित है। अर्थात् कर्मों में कुशलता ही योग है।
प्रबंधन वस्तुतः विचार, लक्ष्य और कार्यों को योजनाबद्ध ढंग से क्रियान्वित करने की कला एवं विज्ञान है। यह उपलब्ध संसाधनों, समय और प्रक्रियाओं का सर्वोत्तम उपयोग करते हुए लक्ष्य प्राप्ति का विज्ञान है। गीता इसी कार्यकुशलता को जीवन की सफलता का आधार मानती है।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥ (गीता 2.50)
अर्थात समत्व बुद्धि से युक्त व्यक्ति शुभ और अशुभ दोनों से ऊपर उठ जाता है। इसलिए योग में स्थित होकर कर्म करो, क्योंकि कर्मों में कुशलता ही योग है।
आज के आधुनिक प्रबंधन विज्ञान के जनक एफ. डब्ल्यू. टेलर (F.W. Taylor) ने भी कार्य नियोजन, दक्षता और उत्पादकता पर विशेष बल दिया। उनका मत था कि उत्पादकता बढ़ने से कर्मचारी और नियोक्ता—दोनों को लाभ होता है। यह कार्य के प्रति मानसिक तत्परता और सकारात्मक कार्य-संस्कृति का निर्माण करता है। यही मानसिक क्रांति गीता भी प्रेरित करती है। इसलिए गीता को कार्य के प्रति समर्पण और कार्यकुशलता की मानसिक क्रांति का उद्घोष कहा जा सकता है।
ध्येय साधना (Management by Objectives)
गीता का एक महत्वपूर्ण प्रबंधन सिद्धांत ध्येय साधना है। श्रीकृष्ण अर्जुन को व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज, राष्ट्र, न्याय और धर्म के लिए युद्ध करने का संदेश देते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि किसी भी संगठन का नेतृत्वकर्ता केवल अपने हित के लिए नहीं, बल्कि संगठन, समाज और राष्ट्र के व्यापक हित को सर्वोपरि रखकर कार्य करे।
गीता के प्रमुख प्रबंधन सूत्र
1. आलस्य और कायरता का त्याग
दूसरे अध्याय के तीसरे श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ।
अर्थात् हे अर्जुन! कायरता और दुर्बलता को त्यागो। आगे वे कहते हैं—
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप।
अर्थात् तुच्छ हृदय-दुर्बलता का त्याग कर अपने कर्तव्य के लिए खड़े हो जाओ।
यह संदेश प्रत्येक प्रबंधक और कर्मयोगी के लिए प्रेरणास्रोत है।
2. परिस्थितियों से विचलित न होना
गीता सिखाती है कि अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियों से विचलित हुए बिना लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ते रहना चाहिए।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।
ज्ञानी व्यक्ति हर्ष और शोक से ऊपर उठकर समभाव बनाए रखता है।
3. समत्व भाव
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते।
अर्थात् जो व्यक्ति सुख-दुःख में समान रहता है, वही स्थायी सफलता का अधिकारी बनता है।
4. स्थिर बुद्धि
गीता का एक महत्वपूर्ण प्रबंधन सूत्र यह है कि सफलता में अहंकार और असफलता में निराशा—दोनों से बचते हुए स्थिर बुद्धि से लक्ष्य की ओर बढ़ना चाहिए।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥
5. चित्त की स्थिरता
श्रीकृष्ण के अनुसार मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष उसके अपने मन से है। जो व्यक्ति शांत चित्त से परिस्थितियों का विश्लेषण करता है, वही उचित और प्रभावी निर्णय ले सकता है। यही गुण एक सफल प्रबंधक की पहचान भी है।
6. पूर्ण समर्पण
गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रबंधन सूत्र है—
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
अर्थात् मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल की चिंता में नहीं। यही सिद्धांत उत्कृष्ट कार्य-संस्कृति का आधार है।
7. कर्म आधारित पहचान
गीता के अनुसार व्यक्ति की पहचान उसके जन्म, जाति, रंग या परिवार से नहीं, बल्कि उसके कर्म, चरित्र और व्यवहार से होती है। आधुनिक प्रबंधन भी योग्यता, कार्यकुशलता और प्रदर्शन को ही सफलता का आधार मानता है।
8. निरंतर प्रयास
गीता सिखाती है कि न छोटी-छोटी सफलताओं से अत्यधिक उत्साहित होना चाहिए और न असफलताओं से निराश। लक्ष्य प्राप्ति तक सतत प्रयास ही सफलता का मार्ग है।
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥ (गीता 2.38)
9. परिवर्तन को स्वीकार करना
एक सफल प्रबंधक परिवर्तन से भयभीत नहीं होता, बल्कि उसे अवसर के रूप में स्वीकार करता है। श्रीकृष्ण कहते हैं—
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करता है, उसी प्रकार जीवन में परिवर्तन भी स्वाभाविक और आवश्यक है। प्रबंधन में भी निरंतर नवाचार और परिवर्तन को अपनाना सफलता की कुंजी है।
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद प्रायः कहते हैं कि रोजमर्रा के जीवन के प्रत्येक आयाम में कुशल प्रबंधन आवश्यक है। किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए व्यक्ति, संसाधन और प्रयासों का समन्वित संचालन ही वास्तविक प्रबंधन है, और यही भगवद्गीता का दिव्य संदेश भी है।
