गीता के मूल में हिंसा नहीं है।

नकारात्मक भावनाओं से युद्ध करना सिखाती है गीता

महात्मा गांधी भगवद्गीता को अपनी ‘माँ’ और आध्यात्मिक ज्ञान का विश्वकोष मानते थे। किसी भी अन्य पुस्तक या शास्त्र ने उन्हें उतना प्रभावित नहीं किया, उनके चरित्र को उतना नहीं गढ़ा और उनके जीवन को उतनी गहराई तथा स्थायित्व के साथ परिवर्तित नहीं किया, जितना भगवद्गीता ने किया। उन्होंने जितनी भी पुस्तकें पढ़ीं, उनमें केवल गीता ही उनके जीवन के सबसे कठिन समय में शक्ति और सांत्वना का अचूक स्रोत बनी।

आध्यात्मिक मार्गदर्शक ग्रंथ के रूप में गीता न केवल उनकी निरंतर साथी थी, बल्कि वह उनकी ‘शाश्वत माँ’ थी, जिसका वे अपनी सांसारिक माँ से भी अधिक सम्मान करते थे। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जो ग्रंथ महाभारत के युद्ध की पृष्ठभूमि में प्रकट हुआ, वही महात्मा गांधी जैसे अहिंसा के पुजारी के जीवन का आधार कैसे बन गया?

वास्तव में यह एक सामान्य भ्रांति है कि गीता का मूल संदेश हिंसा है। सत्य यह है कि गीता के मूल में हिंसा नहीं, बल्कि धर्म, आत्मबोध और आंतरिक विजय का संदेश है। गीता बाहरी युद्ध से अधिक मनुष्य के भीतर चलने वाले युद्ध की चर्चा करती है। आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने के लिए मनुष्य को अपने अहंकार, आसक्ति, मोह, स्वार्थ और नकारात्मक प्रवृत्तियों का परित्याग करना पड़ता है। यही वास्तविक युद्ध है, जिसे गीता लड़ना सिखाती है।

इसलिए गीता को हिंसा या युद्ध का ग्रंथ कहना उचित नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण के उपदेश हमें अपने आंतरिक संघर्षों को समझने और उन पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देते हैं। निराशा, काम, क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, राग, द्वेष, असुरक्षा, आसक्ति, लालच और अन्य नकारात्मक भावनाओं का नाश करना ही वास्तविक विजय है। जब मनुष्य इन विकारों पर विजय प्राप्त करता है, तभी उसके भीतर अहिंसा एक दिव्य गुण के रूप में प्रकट होती है।

भगवद्गीता में अहिंसा को योगी का एक महत्वपूर्ण गुण बताया गया है। योगी वह है जो सभी प्राणियों के सुख-दुःख को अपना समझता है और समत्व की भावना के साथ आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होता है। यही मार्ग अंततः उसे आंतरिक शांति और आत्मिक आनंद की प्राप्ति कराता है।

वास्तव में धर्म ही गीता का मूल विषय है। गीता धर्म के गहन सिद्धांतों पर आधारित एक दिव्य संवाद है। धर्म केवल किसी संप्रदाय या मत का नाम नहीं, बल्कि वह सिद्धांत है जो व्यक्ति, समाज और समस्त सृष्टि के संतुलन तथा कल्याण का आधार है। गीता धर्म के इसी व्यापक स्वरूप की शिक्षा देती है।

कुछ लोग यह भी मानते हैं कि गीता अहिंसा को सर्वोच्च धर्म मानते हुए युद्ध का समर्थन करती है। यह भी एक भ्रम है। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि अहिंसा का पालन तब तक किया जाना चाहिए, जब तक वह शाश्वत धर्म की रक्षा में बाधक न बने। जब अधर्म समाज और मानवता के लिए संकट बन जाए, तब धर्म की रक्षा करना भी आवश्यक कर्तव्य है।

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के सोलहवें अध्याय (श्लोक 1–3) में दैवी सम्पदा के 26 गुणों का वर्णन करते हुए अहिंसा को उनमें एक प्रमुख गुण बताया है। वहीं दसवें अध्याय (श्लोक 4–5) में वे कहते हैं कि मनुष्यों के भीतर उत्पन्न होने वाले अनेक श्रेष्ठ भावों में अहिंसा भी मेरी ही विभूति है—

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः।

अर्थात अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, यश और अपयश—ये सभी भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।

श्रीकृष्ण कभी नहीं चाहते कि मनुष्य हिंसक बने। वे चाहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वधर्म का पालन करे और जीवन के सभी आंतरिक तथा बाह्य संघर्षों में धर्म की विजय सुनिश्चित करे। इसलिए हमारा कर्तव्य है कि हम अपने आध्यात्मिक ज्ञान में वृद्धि करें और किसी भी प्राणी को अनावश्यक पीड़ा या कष्ट न पहुँचाएँ।

महात्मा गांधी ने भी गीता से यही शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने जीवनभर गीता के सिद्धांतों का पालन करते हुए सत्य और अहिंसा के मार्ग को अपनाया तथा समस्त मानवता को इसी मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।

गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद प्रायः उद्धृत करते हैं कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख मार्गदर्शक के रूप में सत्याग्रह—जो सत्य और अहिंसा पर आधारित था—के माध्यम से सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक अन्याय का सामना करते हुए गांधीजी को अनेक अंधकारमय क्षणों और आस्था के संकटों से गुजरना पड़ा। ऐसे प्रत्येक अवसर पर उन्होंने शक्ति, सांत्वना और नैतिक-आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए भगवद्गीता का आश्रय लिया।

गांधीजी के अनुसार महाभारत का युद्ध केवल कौरवों और पांडवों के बीच हुआ ऐतिहासिक युद्ध नहीं था, बल्कि वह प्रत्येक मनुष्य के हृदय में निरंतर चलने वाले धर्म और अधर्म, सद्गुण और दुर्गुण, सत्य और असत्य के संघर्ष का प्रतीक है। इसी दृष्टि से उन्होंने गीता को मानव जीवन के आंतरिक नैतिक युद्ध का दिव्य मार्गदर्शक माना। उनका यह भी मत था कि महाभारत का उद्देश्य युद्ध की अनिवार्यता सिद्ध करना नहीं, बल्कि अंततः हिंसा और युद्ध की निरर्थकता को उजागर करना है।

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