साहस का एक शक्तिशाली संदेश है गीता।

“थके न तू, रुके न तू, शीश यह झुके न यूँ।
मन में एक विश्वास जगा, दृढ़ यह संकल्प कर, निश्चय अपनी जीत कर।”

भगवद्गीता साहस, वीरता और कर्तव्यनिष्ठा का अद्वितीय संदेश देती है। इसके आरम्भ में ही युद्धभूमि को धर्मक्षेत्र और कुरुक्षेत्र कहा गया है। यह संकेत है कि जीवन स्वयं एक सतत संघर्ष है, जहाँ मनुष्य को न्याय, सत्य और धर्म की रक्षा के लिए साहसपूर्वक खड़ा होना पड़ता है। गीता व्यक्ति को अन्याय और अधर्म का निर्भीक होकर सामना करने की प्रेरणा देती है।

वास्तव में, अर्जुन और श्रीकृष्ण का संवाद कायरता से साहस की यात्रा है।

अर्जुन क्षत्रिय कुल में जन्मे, परंपरा से प्रशिक्षित और अद्वितीय धनुर्धर थे। उनका धर्म राज्य, समाज और धर्म की रक्षा करना था। एक क्षत्रिय से अपेक्षा की जाती है कि वह वीर, साहसी और अपने कर्तव्य के लिए प्राणों का भी त्याग करने को तत्पर रहे।

किन्तु जब अर्जुन ने युद्धभूमि में अपने गुरुजनों, बंधु-बांधवों, मित्रों और संबंधियों को सामने खड़ा देखा, तो वे मोह, करुणा और विषाद से भर गए। उन्होंने कुल-नाश, वर्णसंकर, सामाजिक अव्यवस्था, पाप और पारिवारिक परंपराओं के विनाश जैसे अनेक तर्क प्रस्तुत करते हुए युद्ध करने से इंकार कर दिया। यहाँ तक कि उन्होंने कहा कि वे अपने प्रियजनों की हत्या करने की अपेक्षा भिक्षा माँगकर जीवन-यापन करना अधिक उचित समझते हैं।

अर्जुन की यह स्थिति देखकर श्रीकृष्ण आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने देखा कि महान धनुर्धर का शरीर काँप रहा है, मुख सूख रहा है, रोमांच हो रहा है, गांडीव हाथ से छूट रहा है और वह रथ के पिछले भाग में बैठ गया है। तब श्रीकृष्ण ने उसे उसके क्षत्रिय धर्म का स्मरण कराया।

उन्होंने कहा कि ऐसी मानसिक दुर्बलता किसी वीर पुरुष को शोभा नहीं देती। कायरता न इस लोक में यश दिलाती है और न परलोक में कल्याण का कारण बनती है। इसलिए उन्होंने अर्जुन से कहा कि वह दुर्बलता का त्याग करे और साहसपूर्वक अपने कर्तव्य का पालन करे।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से स्पष्ट शब्दों में कहा—

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥ (गीता 2.3)

अर्थात्— हे पार्थ! इस नपुंसकता को धारण मत करो। यह तुम्हें शोभा नहीं देती। हृदय की तुच्छ दुर्बलता का त्याग करके उठो, हे शत्रुओं का दमन करने वाले।

अर्जुन के भीतर वीरता का संचार करने के लिए श्रीकृष्ण उन्हें बार-बार महाबाहो, परंतप, पुरुषव्याघ्र, भरतश्रेष्ठ, कुरुप्रवीर, गुडाकेश, धनंजय और सव्यसाची जैसे सम्मानसूचक संबोधनों से पुकारते हैं। इन संबोधनों के माध्यम से वे अर्जुन को उसके वास्तविक स्वरूप और सामर्थ्य का बोध कराते हैं।

भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय में श्रीकृष्ण क्षत्रिय के स्वाभाविक गुणों का वर्णन करते हुए कहते हैं—

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्॥ (18.43)

अर्थात् साहस, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध से कभी पीठ न दिखाना, उदारता और नेतृत्व—ये क्षत्रिय के स्वाभाविक गुण हैं।

इसी प्रकार दूसरे अध्याय के श्लोक 2.31 से 2.38 तक श्रीकृष्ण बताते हैं कि एक योद्धा के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर कोई कर्तव्य नहीं है। यदि वह विजय प्राप्त करता है तो पृथ्वी का वैभव प्राप्त करेगा और यदि युद्धभूमि में वीरगति प्राप्त होती है तो स्वर्ग का अधिकारी बनेगा। इसलिए जीत और हार दोनों को समान मानकर धर्म के लिए संघर्ष करना ही उसका कर्तव्य है।

यदि कोई व्यक्ति उचित और न्यायपूर्ण संघर्ष से पलायन करता है, तो वह केवल अपने कर्तव्य का ही त्याग नहीं करता, बल्कि अपना सम्मान भी खो देता है। एक सम्मानित व्यक्ति के लिए अपयश मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक होता है।

श्रीकृष्ण कायरता का समर्थन नहीं करते। आत्मा की अमरता, कर्मयोग और जीवन के परम उद्देश्य का उपदेश देने के बाद भी वे अर्जुन से अंततः यही कहते हैं—

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥ (11.33)

अर्थात्— इसलिए उठो, यश प्राप्त करो, शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य का भोग करो। ये सब मेरे द्वारा पहले ही पराजित किए जा चुके हैं; तुम तो केवल निमित्त मात्र बनो।

इसके साथ ही श्रीकृष्ण अर्जुन को यह भी उपदेश देते हैं—

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥ (8.7)

अर्थात्— प्रत्येक समय मेरा स्मरण करते हुए अपना कर्तव्य निभाओ। अपना मन और बुद्धि मुझे समर्पित करोगे तो निःसंदेह मुझे ही प्राप्त हो जाओगे।

जो सिद्धांत बाह्य जीवन में लागू होता है, वही आंतरिक जीवन में भी लागू होता है। प्रत्येक मनुष्य को अपने भीतर भी एक युद्ध लड़ना पड़ता है। यह युद्ध काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और भय जैसे आंतरिक शत्रुओं के विरुद्ध होता है।

श्रीकृष्ण कहते हैं—

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥ (3.37)

अर्थात् काम और क्रोध ही मनुष्य के महान शत्रु हैं। इन पर विजय प्राप्त करने के लिए भी उतना ही साहस और दृढ़ संकल्प चाहिए, जितना बाहरी युद्ध के लिए आवश्यक होता है।

ऐसा साहस केवल आत्मविश्वास से नहीं, बल्कि ईश्वर में दृढ़ विश्वास से उत्पन्न होता है। जब मनुष्य यह अनुभव करता है कि परमात्मा सदैव उसके साथ हैं, तब भय और निराशा स्वतः समाप्त होने लगते हैं।

कुरुक्षेत्र में अर्जुन का आत्म-संदेह आज भी प्रत्येक मनुष्य के जीवन में किसी-न-किसी रूप में उपस्थित होता है। परिस्थितियाँ बदल गई हैं, लेकिन चुनौतियाँ आज भी वैसी ही हैं। इसलिए जीवन की कठिनाइयों का साहस, धैर्य और मुस्कान के साथ सामना करने की श्रीकृष्ण की शिक्षा आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी हजारों वर्ष पूर्व थी।

गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज कहा करते थे कि भगवद्गीता पलायनवाद को कभी स्वीकार नहीं करती। कायरता को कृत्रिम नैतिकता के पर्दे में नहीं छिपाया जा सकता। गीता सिखाती है कि जो कर्तव्य करना चाहिए, उसे किसी भी कठिन परिस्थिति में टालना नहीं चाहिए।

निष्कर्षतः, जीवन में जो भी कार्य करें, उसे साहस, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प के साथ करें। जैसा कि श्रीकृष्ण कहते हैं—

तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः।

और यही भावना इन पंक्तियों में भी व्यक्त होती है—

थके न तू, रुके न तू, शीश यह झुके न यूँ।
मन में एक विश्वास जगा, दृढ़ यह संकल्प कर, निश्चय अपनी जीत कर।

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