स्वामी विवेकानंद ने कहा था— “मैं मन की एकाग्रता को ही शिक्षा का वास्तविक सार मानता हूँ, न कि केवल विषयों के संग्रह को। यदि मुझे फिर से शिक्षा ग्रहण करने का अवसर मिले, तो मैं विषयों का अध्ययन करने के स्थान पर मन की एकाग्रता और उसे विषयों से हटाकर नियंत्रित करने की शक्ति को विकसित करने पर अधिक ध्यान दूँगा। जब यह साधन पूर्ण हो जाएगा, तब इच्छानुसार विषयों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकेगा।”
प्रश्न यह है कि एकाग्रता क्या है?
एकाग्रता का अर्थ है—पहला, अपने विचारों और भावनाओं को अन्य सभी रुचियों और आकर्षणों से मुक्त करने की क्षमता; और दूसरा, उन्हें किसी एक लक्ष्य, वस्तु या चेतना की अवस्था पर केंद्रित करने की क्षमता। एकाग्रता ऊर्जा के गतिशील प्रवाह से लेकर पूर्ण शांति और स्थिरता तक अनेक रूपों में प्रकट हो सकती है।
मानसिक गतिविधि के प्रत्येक स्तर पर सफलता की कुंजी एकाग्रता ही है। सामान्यतः लोग यह नहीं समझते कि एकाग्र मन केवल इसलिए सफल नहीं होता कि वह समस्याओं को शीघ्र हल कर लेता है, बल्कि इसलिए भी कि उसकी केंद्रित ऊर्जा के सामने अनेक समस्याएँ स्वतः ही महत्वहीन हो जाती हैं। एकाग्र मन अवसरों, अंतर्दृष्टि और प्रेरणाओं को आकर्षित करता है, जो कम केंद्रित व्यक्तियों को मात्र भाग्य का परिणाम प्रतीत होती हैं।
जिस व्यक्ति का मन एकाग्र होता है, उसे अपने कार्यों और विचारों में ऐसी प्रेरणाएँ प्राप्त होती हैं, जिन्हें लोग कभी-कभी दैवी कृपा मान लेते हैं। वास्तव में यह एकाग्रता की शक्ति का परिणाम होता है। एकाग्रता हमारी शक्तियों को जागृत और संगठित करती है, बाधाओं को दूर करती है तथा जीवन को उद्देश्यपूर्ण दिशा प्रदान करती है। इसलिए अनेक दृष्टियों से एकाग्रता ही सफलता की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी है।
स्वामी विवेकानंद और निशानेबाजी का प्रसंग
जब स्वामी विवेकानंद विदेश में थे, तब एक दिन वे एक शांत क्षेत्र में भ्रमण कर रहे थे। वहाँ एक झील के किनारे कुछ लड़के बंदूक से पानी में तैरते अंडों के छिलकों पर निशाना लगाने का प्रयास कर रहे थे, पर उनका एक भी निशाना सही नहीं लग रहा था।
स्वामीजी उनके पास पहुँचे। लड़कों ने मजाक में पूछा— “क्या आप निशाना लगा सकते हैं?”
स्वामीजी ने शांत भाव से बंदूक ली, लक्ष्य पर पूरा ध्यान केंद्रित किया और पहली ही गोली में अंडे के छिलके को भेद दिया। उन्होंने यह निशाना कई बार लगातार लगाया। यह देखकर सभी लड़के आश्चर्यचकित रह गए।
उन्होंने पूछा— “क्या आपने पहले निशानेबाजी का अभ्यास किया है?”
स्वामीजी मुस्कराकर बोले— “मैंने एकाग्रता का अभ्यास किया है। चाहे बंदूक चलानी हो, पुस्तक पढ़नी हो या तीर-कमान चलाना हो—सफलता का रहस्य एकाग्रता ही है।”
स्वामीजी अक्सर अर्जुन का उदाहरण देते थे। जब द्रोणाचार्य ने पूछा— “तुम्हें चिड़िया की आँख के अलावा और क्या दिखाई दे रहा है?” तो अर्जुन ने उत्तर दिया— “मुझे केवल चिड़िया की आँख दिखाई दे रही है।” स्वामीजी कहते थे—यही सच्ची एकाग्रता है।
गीता में एकाग्रता का स्वरूप
भगवद्गीता (6.19) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥
अर्थात् जैसे वायु रहित स्थान में दीपक की लौ स्थिर रहती है, वैसे ही योगाभ्यास में स्थित योगी का चित्त स्थिर हो जाता है।
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज कहते हैं कि इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने दीपक की लौ की अत्यंत सुंदर उपमा दी है। वायु के बीच लौ स्वाभाविक रूप से डगमगाती रहती है, परंतु वायु रहित स्थान में वही लौ चित्रवत स्थिर हो जाती है। इसी प्रकार मन स्वभाव से चंचल है और उसे नियंत्रित करना अत्यंत कठिन है। किंतु जब योगी का मन ईश्वर में स्थित हो जाता है, तब वह इच्छाओं की चंचल हवाओं से सुरक्षित हो जाता है।
भक्ति और साधना की शक्ति से योगी अपने मन को निरंतर संयमित रखता है। जब मन पूर्णतः एकाग्र हो जाता है, तब उसकी केंद्रित शक्ति को किसी भी श्रेष्ठ उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। यही एकाग्रता साधना का सार और जीवन की महान उपलब्धियों का आधार है।
