क्रोध प्रबंधन (Anger Management) एक प्रकार की परामर्श प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने स्वास्थ्य, कार्य, व्यवहार तथा व्यक्तिगत संबंधों को प्रभावित करने वाले क्रोध पर नियंत्रण करना सीखता है। क्रोध एक स्वाभाविक मानवीय भावना है, जो प्रत्येक व्यक्ति में किसी न किसी रूप में उत्पन्न होती है।
क्रोध का अर्थ
क्रोध अथवा गुस्सा मानव मन की एक स्वाभाविक भावना है, जिसे सामान्यतः नकारात्मक माना जाता है। जब व्यक्ति क्रोधित होता है, तब उसके शरीर में अनेक शारीरिक परिवर्तन दिखाई देते हैं, जैसे—हृदय गति का बढ़ जाना, रक्तचाप में वृद्धि होना, आँखों का लाल हो जाना, मुट्ठियाँ भींच जाना तथा शरीर का तापमान बढ़ जाना आदि।
क्रोध के अनेक कारण हो सकते हैं। उदाहरण के लिए—किसी प्रिय व्यक्ति को खो देना, दुःख, यौन कुंठा, अत्यधिक थकान, भूख, शारीरिक पीड़ा, कुछ दवाओं का प्रभाव, प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम (PMS), अपमानित होना, स्वयं को असुरक्षित महसूस करना, यह अनुभव होना कि आपकी उपेक्षा की जा रही है अथवा आपको गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है, शराब या नशीले पदार्थों का सेवन तथा कोई ऐसी घटना जो अप्रिय स्मृतियों को पुनः जागृत कर दे।
कुछ लोग बार-बार और अनुचित रूप से क्रोधित हो जाते हैं तथा क्रोध आने पर अपने व्यवहार पर नियंत्रण खो बैठते हैं। जब क्रोध इस प्रकार नियंत्रण से बाहर हो जाता है, तब वह पारिवारिक संबंधों, कार्यस्थल, सामाजिक जीवन और यहाँ तक कि कानूनी समस्याओं का कारण भी बन सकता है। अनियंत्रित क्रोध विवाद, हिंसा और शारीरिक संघर्ष को जन्म देता है।
मेंटल हेल्थ फाउंडेशन द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार 28 प्रतिशत वयस्कों ने स्वीकार किया कि उन्हें कभी-कभी अपने अत्यधिक क्रोध की चिंता रहती है, जबकि 32 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उनका कोई मित्र या पारिवारिक सदस्य क्रोध पर नियंत्रण रखने में कठिनाई अनुभव करता है।
हर व्यक्ति के शरीर में क्रोध की एक जैविक प्रतिक्रिया होती है। क्रोध की स्थिति में शरीर कोर्टिसोल और एड्रेनालिन जैसे तनाव हार्मोन छोड़ता है, जिससे हृदय गति, रक्तचाप, शरीर का तापमान तथा श्वसन गति बढ़ जाती है। इसे शरीर की “फाइट ऑर फ्लाइट” (Fight or Flight) प्रतिक्रिया कहा जाता है। यदि शरीर को बार-बार अत्यधिक तनाव हार्मोनों का सामना करना पड़े, तो इससे अनेक शारीरिक एवं मानसिक समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
वास्तव में क्रोध हमारे भीतर निवास करने वाला ऐसा शत्रु है, जो किसी दूसरे को नहीं, बल्कि सबसे अधिक स्वयं हमें ही हानि पहुँचाता है। व्यक्ति का अनियंत्रित क्रोध प्रायः उसके लिए अभिशाप सिद्ध होता है। इसलिए क्रोध का उचित प्रबंधन अत्यंत आवश्यक है।
क्रोध पर नियंत्रण पाने के लिए सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि उसका मूल कारण क्या है। इस विषय पर भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में अत्यंत वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥ (गीता 2.62)
अर्थात् मनुष्य जब इन्द्रियों के विषयों का बार-बार चिंतन करता है, तब उनमें उसकी आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना से क्रोध जन्म लेता है।
जब हम किसी वस्तु या विषय से मिलने वाले सुख का निरंतर चिंतन करते हैं, तब हमारा मन उसमें आसक्त हो जाता है। यह आसक्ति प्रारम्भ में सामान्य प्रतीत होती है, परन्तु धीरे-धीरे वही इच्छा और कामना का रूप धारण कर लेती है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को मदिरापान की आदत है, तो उसके मन में बार-बार मदिरापान करने की इच्छा उत्पन्न होगी। यदि कोई धूम्रपान का अभ्यस्त है, तो उसका मन निरंतर उसी सुख की तलाश करेगा। इस प्रकार आसक्ति कामना को जन्म देती है।
कामना उत्पन्न होने के बाद दो नई समस्याएँ जन्म लेती हैं—लोभ और क्रोध। यदि कामना पूरी हो जाती है, तो उससे लोभ उत्पन्न होता है। रामचरितमानस में कहा गया है—
“जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई।”
अर्थात् जितना अधिक लाभ मिलता है, उतना ही लोभ बढ़ता जाता है। इसलिए इच्छाओं की पूर्ति से उनका अंत नहीं होता, बल्कि वे और अधिक प्रबल होती जाती हैं।
यदि संसार का समस्त धन, ऐश्वर्य और भोग-विलास भी किसी व्यक्ति को प्राप्त हो जाए, तब भी उसकी इच्छाएँ समाप्त नहीं होतीं। इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति कामनाओं को ही दुःख का मूल कारण मानकर उनका संयम करता है।
अब प्रश्न यह है कि यदि इच्छाओं की पूर्ति में बाधा उत्पन्न हो जाए, तो क्या होगा?
भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि ऐसी स्थिति में क्रोध उत्पन्न होता है। इसलिए यह समझना चाहिए कि क्रोध अपने आप उत्पन्न नहीं होता, बल्कि इच्छाओं की पूर्ति में बाधा आने से पैदा होता है। इच्छाएँ आसक्ति से उत्पन्न होती हैं और आसक्ति इन्द्रियों के विषयों के निरंतर चिंतन से।
इस प्रकार स्पष्ट है कि विषयों का बार-बार चिंतन अंततः मनुष्य को लोभ और क्रोध जैसे मानसिक विकारों की ओर ले जाता है।
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण क्रोध के दुष्परिणामों का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए कहते हैं—
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥ (गीता 2.63)
अर्थात् क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति भ्रमित हो जाती है, स्मृति के भ्रमित होने से बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नष्ट हो जाने पर मनुष्य का पतन निश्चित हो जाता है।
जैसे प्रातःकाल की धुंध सूर्य के प्रकाश को ढक देती है, उसी प्रकार क्रोध मनुष्य की निर्णय-क्षमता को धूमिल कर देता है। क्रोध की अवस्था में व्यक्ति ऐसे निर्णय लेता है, जिन पर बाद में उसे पश्चाताप करना पड़ता है।
जब बुद्धि भ्रमित हो जाती है, तब मनुष्य उचित और अनुचित, धर्म और अधर्म तथा हित और अहित का विवेक खो देता है। वह केवल भावनाओं के आवेग में बहता रहता है और यहीं से उसके पतन की शुरुआत होती है।
महाभारत इसका उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। दुर्योधन का सबसे बड़ा शत्रु उसका क्रोध और अहंकार था, जबकि युधिष्ठिर की सबसे बड़ी शक्ति उनका धैर्य और संयम था। महाभारत युद्ध के बाद धृतराष्ट्र भी पुत्र-वियोग के कारण इतने क्रोधित हो गए कि उन्होंने भीम को आलिंगन में लेकर मारने का प्रयास किया, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी बुद्धिमत्ता से विफल कर दिया।
इसी प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल के सौ अपराधों तक क्षमा करके अद्भुत धैर्य, सहनशीलता और आत्मसंयम का परिचय दिया। यह संदेश आज भी हमें सिखाता है कि क्रोध पर विजय ही वास्तविक आत्मविजय है।
