विशुद्ध भक्ति देती है ब्रह्म पद पाने की शक्ति — गीता

14वें अध्याय के 26वें श्लोक में भगवान कहते हैं—

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥

अर्थात् जो लोग विशुद्ध भक्ति के साथ मेरी सेवा करते हैं, वे प्रकृति के तीनों गुणों से ऊपर उठ जाते हैं और ब्रह्म पद के स्तर को प्राप्त कर लेते हैं।

जब मैं भक्ति कहता हूँ, तो मैं किसी मत या धारणा में विश्वास की बात नहीं कर रहा हूँ। मेरा आशय पूरे भरोसे और आस्था के साथ आगे बढ़ने से है। तब प्रश्न उठता है कि मैं भरोसा कैसे करूँ?

आप इस धरती पर आराम से बैठे हैं, यह भी भरोसा ही है। यह गोल धरती बड़ी तेजी से अपनी धुरी पर और सूर्य के चारों ओर घूम रही है। मान लीजिए अचानक यह धरती उल्टी दिशा में घूमने लगे, तो हो सकता है कि आप जहाँ बैठे हैं, वहाँ से छिटककर कहीं और चले जाएँ। आप नहीं जानते कि आप कहाँ पहुँचेंगे। फिर भी आप आराम से बैठे हैं, गहरी साँस लेते हैं, मुस्कराते हैं, दूसरों से बातें करते हैं। इन सबके लिए आपको बहुत अधिक भरोसे की आवश्यकता होती है।

लेकिन यह सब आप अनजाने में और बिना प्रेमभाव के कर रहे हैं। इस भरोसे को पूरी जागरूकता और प्रेम के साथ करना सीखिए — यही भक्ति है। यह सृष्टि जैसी है, उस पर वैसे ही भरोसा करते हुए यदि आपने जागरूकता और प्रेम के साथ यहाँ बैठना सीख लिया, तो यही भक्ति है। भक्ति कोई मत या मान्यता नहीं है। भक्ति इस अस्तित्व में होने का सबसे खूबसूरत तरीका है।

इंसान आमतौर पर शरीर, मन और भावनाओं से बना है। यही वजह है कि ज्यादातर लोग अपने शरीर, मन और भावनाओं को समर्पित किए बिना किसी चीज के प्रति स्वयं को समर्पित नहीं कर सकते। विवाह का अर्थ भी यही है कि आप एक इंसान के लिए अपनी हर चीज समर्पित कर दें — अपना शरीर, अपना मन और अपनी भावनाएँ।

कुछ लोगों के लिए यह समर्पण शरीर, मन और भावनाओं से भी परे, एक ऐसे धरातल पर पहुँच गया जहाँ यह उनके लिए परम सत्य बन गया। ऐसे लोगों में से एक थीं मीराबाई, जो श्रीकृष्ण को अपना पति मानती थीं। कृष्ण के प्रति मीरा इतनी दीवानी थीं कि मात्र आठ वर्ष की आयु में ही उन्होंने मन-ही-मन श्रीकृष्ण से विवाह कर लिया।

उनके भावों की तीव्रता इतनी गहन थी कि कृष्ण उनके लिए सच्चाई बन गए। यह मीरा के लिए कोई मतिभ्रम नहीं था, बल्कि उनके लिए यह वास्तविकता थी कि कृष्ण उनके साथ उठते-बैठते थे और उनके साथ विचरण करते थे। ऐसे में मीरा के पति को उनके साथ कठिनाई होने लगी, क्योंकि वे सदैव अपने दिव्य प्रेमी के साथ रहती थीं।

उनके पति ने हर संभव प्रयास किया कि वह इस स्थिति को समझ सकें, क्योंकि वह मीरा से वास्तव में प्रेम करते थे। लेकिन वह यह नहीं समझ सके कि मीरा के साथ क्या हो रहा है। मीरा जिस अवस्था से गुजर रही थीं, वह उनके लिए अत्यंत वास्तविक थी, लेकिन उनके पति को कुछ दिखाई नहीं देता था।

एक दिन निराश होकर उन्होंने स्वयं को नीले रंग से रंग लिया और कृष्ण जैसी वेशभूषा पहनकर मीरा के सामने पहुँचे। दुर्भाग्यवश उन्होंने गलत प्रकार के रंग का उपयोग कर लिया, जिससे उन्हें एलर्जी हो गई और शरीर पर चकत्ते निकल आए।

मीरा के आसपास के लोग प्रारम्भ में बहुत चकित थे कि आखिर उनके साथ क्या किया जाए। लेकिन जब कृष्ण के प्रति उनका प्रेम अपनी चरम ऊँचाइयों तक पहुँच गया, तब लोगों को समझ आया कि वे कोई साधारण स्त्री नहीं, बल्कि एक असाधारण आत्मा हैं। लोग उनका आदर करने लगे। यह देखकर कि वे ऐसी बातें कर सकती हैं जो कोई और नहीं कर सकता, उनके आसपास लोगों की भीड़ जुटने लगी।

पति के निधन के बाद मीरा पर व्यभिचार का आरोप लगाया गया। उन दिनों व्यभिचार के लिए मृत्युदंड दिया जाता था। इसलिए शाही दरबार में उन्हें विषपान करने के लिए दिया गया। मीरा ने श्रीकृष्ण को स्मरण किया और विष पीकर वहाँ से चली गईं। लोग उनके मरने की प्रतीक्षा करते रहे, लेकिन वे स्वस्थ और प्रसन्न बनी रहीं। ऐसी अनेक घटनाएँ उनके जीवन में हुईं।

दरअसल, भक्ति ऐसी शक्ति है जो व्यक्ति को स्वयं से भी रिक्त कर देती है। मीरा ने विष का प्याला पिया, लेकिन विष को अमृत बना दिया।

अविभिचारिणी भक्ति का एक और उदाहरण धन्ना जाट का है, जिन्होंने अपने अनन्य भाव से पत्थर में भी ठाकुरजी के दर्शन किए। भगवान ने धन्ना की गायें चराईं, खेत बोए और तुंबे की फसल में से हीरे निकलवाकर अकाल के समय भी उनके भंडार भरे रखे।

गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद कहते हैं कि केवल आत्मा का ज्ञान और शरीर से उसकी भिन्नता को जान लेना ही पर्याप्त नहीं है। इसके लिए भक्तियोग की सहायता से मन को प्रभु श्रीकृष्ण में स्थिर करना चाहिए, जिसके परिणामस्वरूप इच्छा मात्र से मन श्रीकृष्ण के समान निर्गुण हो जाता है।

कई लोग यह सोचते हैं कि यदि मन को भगवान के साकार रूप पर स्थिर किया जाए, तो वह लोकातीत अवस्था तक नहीं पहुँच सकता। और यदि उसे केवल निराकार ब्रह्म में अनुरक्त किया जाए, तभी वह प्रकृति के गुणों से परे हो सकता है। किन्तु इस बात को समझना चाहिए कि भगवान का साकार रूप अनन्त दिव्य गुणों से सम्पन्न है और ये सभी गुण प्रकृति के गुणों से परे हैं। इसलिए भगवान का साकार रूप भी निर्गुण ही है।

जीवन रूपी जहाज के खिवैया श्रीकृष्ण हैं। यदि आपकी नैया तूफानों में डूबने लगे, तो भयभीत मत होना। अनन्य भाव बनाए रखना — स्वयं कृष्ण कन्हैया आपका बेड़ा पार लगाएंगे।

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