विश्वकर्मा और श्रीमद्भगवद्गीता

हाथों में हुनर, कर्म में कौशल और सृजन में लोककल्याण

जब हम भगवान विश्वकर्मा का स्मरण करते हैं तो हमारे सामने केवल निर्माण के देवता की छवि नहीं आती, बल्कि सृजन, शिल्प, तकनीक, परिशुद्धता और कर्म-कौशल की एक पूरी संस्कृति सामने आती है। दूसरी ओर श्रीमद्भगवद्गीता मनुष्य को कर्म छोड़ने की नहीं, बल्कि कर्म को श्रेष्ठ, कुशल, निष्काम और लोकहितकारी बनाने की शिक्षा देती है।

इसीलिए विश्वकर्मा और गीता का संबंध किसी एक कथा में नहीं, बल्कि एक गहरे जीवन-सूत्र में दिखाई देता है,”विश्वकर्मा हाथों को हुनर देते हैं, गीता हुनर को योग बनाना सिखाती है।”

कर्म केवल काम नहीं — साधना भी है
आधुनिक जीवन में हम काम को प्रायः नौकरी, व्यवसाय, उत्पादन या आजीविका से जोड़ते हैं। गीता काम की परिभाषा को इससे कहीं ऊपर उठा देती है। वह कर्म को व्यक्तित्व-निर्माण और आत्मविकास का माध्यम बनाती है। श्रीकृष्ण कहते हैं,”बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥ 2.50॥ इसका अत्यंत प्रसिद्ध सूत्र है,“योगः कर्मसु कौशलम्” — कर्म में कौशल योग है। यही वह स्थान है जहाँ विश्वकर्मा का शिल्प और कृष्ण का कर्मयोग मानो एक-दूसरे से मिलते हैं।
काम पूरा कर देना पर्याप्त नहीं; काम सही ढंग से, पूरी दक्षता, सजगता और उत्कृष्टता से करना भी आवश्यक है।

विश्वकर्मा का पहला संदेश — Vision के बिना Creation नहीं
हर निर्माण दो बार होता है—पहले विचार में और फिर वास्तविकता में। भवन बनने से पहले नक्शे में बनता है, मशीन बनने से पहले मस्तिष्क में और संस्था बनने से पहले किसी के संकल्प में। गीता कहती है,”व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन॥ 2.41॥” अर्थात् निश्चयात्मक बुद्धि एकाग्र होती है। आज के इंजीनियर, चिकित्सक, वास्तुकार, तकनीशियन, उद्योगपति अथवा कारीगर—सभी के लिए पहला प्रश्न होना चाहिए: मैं क्या बना रहा हूँ? और उससे भी बड़ा प्रश्न,”मैं यह क्यों बना रहा हूँ?”Vision स्पष्ट हो तो Skill को Direction मिलती है।

दूसरा संदेश — श्रम से मत भागो
विश्वकर्मा का दर्शन श्रम की प्रतिष्ठा का दर्शन है। कोई भी सृजन बिना कर्म के संभव नहीं। गीता का स्पष्ट संदेश है,” नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥ 3.8॥ अर्थात् अपना नियत कर्म करो; कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है।
इसलिए किसी काम को छोटा समझना स्वयं कर्म की गरिमा को छोटा करना है। काम का पद छोटा-बड़ा हो सकता है, पर ईमानदारी से किया गया कर्म छोटा नहीं होता।

तीसरा संदेश — Skill को Excellence बनाइए

विश्वकर्मा की पहचान केवल निर्माण नहीं, श्रेष्ठ निर्माण है। यही अंतर साधारण कर्म और कुशल कर्म में है। एक ही काम दो व्यक्ति करते हैं—एक केवल उसे समाप्त करता है, दूसरा उसमें अपनी उत्कृष्टता जोड़ देता है। पहला काम करता है, दूसरा अपनी पहचान बनाता है। यहीं गीता का सूत्र फिर सामने आता है—योगः कर्मसु कौशलम्।
कार्यस्थल पर इसका अर्थ है—
C — Continuous Improvement
R — Right Accuracy
A — Advancement / Innovation
F — Finest Quality
T — Training & Discipline
यानी काम ऐसा करो कि हस्ताक्षर की आवश्यकता न पड़े; काम स्वयं बता दे कि इसे किसने किया है।

चौथा संदेश — Profession को Worship बनाइए

गीता 18.46 कर्म को एक और ऊँचाई देती है,”यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥ 18.46॥ कितना सुंदर विचार है—अपने कर्म द्वारा भी परमात्मा की पूजा की जा सकती है। तब चिकित्सक का उपचार, शिक्षक का अध्यापन, किसान की खेती, इंजीनियर का निर्माण, श्रमिक का श्रम और उद्यमी का उद्योग—सब पूजा बन सकते हैं।
शर्त केवल इतनी है कि कर्म में ईमानदारी, उत्कृष्टता और सेवा-भाव जुड़ जाए।
Work → Worship; Profession → Purpose

पाँचवाँ संदेश — निर्माण केवल अपने लिए नहीं
विश्वकर्मा का सृजन समाज के उपयोग के लिए है। गीता भी कर्म को केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं रखती। श्रीकृष्ण राजा जनक का उदाहरण देते हुए कहते हैं,” कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥ 3.20॥ यहाँ महत्वपूर्ण शब्द है—लोकसंग्रह ; अर्थात् कर्म करते समय यह भी देखिए कि उससे समाज का हित कैसे हो।
यही आधुनिक उद्योग और व्यवसाय के लिए बड़ा प्रश्न है,” क्या हमारा Innovation केवल Income बढ़ा रहा है या Impact भी पैदा कर रहा है? सच्चा सृजन वही है जिसमें Profit के साथ Purpose और Progress के साथ People भी हों।

छठा संदेश — अभ्यास से आती है निपुणता
कोई कारीगर पहले दिन ही सिद्धहस्त नहीं बनता। बार-बार का अभ्यास हाथ को हुनर देता है और हुनर को निपुणता। गीता मन के संदर्भ में कहती है,” अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥ 6.35॥ यह सिद्धांत कार्य-कौशल में भी अत्यंत उपयोगी है।
Practice → Precision → Perfection
प्रतिभा शुरुआत करा सकती है, लेकिन निरंतर अभ्यास ही उत्कृष्टता तक पहुँचाता है।

सातवाँ संदेश — सृजन में अहंकार नहीं, समर्पण हो
मनुष्य जब कुछ बड़ा बनाता है तो एक खतरा साथ-साथ जन्म लेता है—“मैंने बनाया” का अहंकार। गीता कर्म को अहंकार से निकालकर समर्पण तक ले जाती है,”मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥ 3.30॥ यही कर्मयोग की परिपक्वता है—
मेहनत मेरी हो, कौशल मेरा हो, प्रयास पूरा हो, पर अहंकार मेरा न हो।

विश्वकर्मा से गीता तक — पाँच चरणों की यात्रा
दृष्टि → श्रम → कौशल → सृजन → समर्पण
दृष्टि बताए—क्या बनाना है।
श्रम उसे आकार दे।
कौशल उसे उत्कृष्ट बनाए।
सृजन समाज के काम आए।
और समर्पण कर्म को योग बना दे।

विश्वकर्मा दिवस इसलिए केवल मशीनों और औजारों की पूजा का अवसर न रहे। यह उन हाथों के सम्मान का पर्व बने जो निर्माण करते हैं; उन मस्तिष्कों का अभिनंदन बने जो नया सोचते हैं; और उस कर्म-संस्कृति का उत्सव बने जिसमें गुणवत्ता, ईमानदारी और लोकहित सर्वोपरि हों।
अंततः विश्वकर्मा और गीता का संयुक्त संदेश शायद इतना ही है; हाथ में हुनर हो,मस्तिष्क में नवाचार हो, कर्म में कौशल हो, हृदय में लोकहित हो।सफलता में अहंकार न हो और सृजन में समर्पण हो।
श्रम जब कौशल बनता है और कौशल जब सृजन बनता है और सृजन जब लोककल्याण बनता है तभी कर्म, कर्मयोग बनता है।

विश्वकर्मा जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ।
डॉ. मारकंडे आहूजा

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