कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हुए हजारों वर्ष बीत चुके हैं, परंतु मनुष्य का आंतरिक संघर्ष आज भी समाप्त नहीं हुआ। आज भी अन्याय है, भय है, मोह है, स्वार्थ है, भ्रम है और कर्तव्य से पलायन की प्रवृत्ति है।
इसलिए गीता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी अर्जुन के समय थी। इस पुस्तक में वर्णित अठारह स्वतंत्रता सेनानियों ने हमें यह सिखाया कि गीता केवल पढ़ने की पुस्तक नहीं, बल्कि जीने की कला है। राम प्रसाद बिस्मिल के निष्काम कर्म से लेकर खुदीराम बोस के निर्भय समर्पण तक, नेताजी के कर्मयोग से लेकर सरदार पटेल के स्थितप्रज्ञ नेतृत्व तक, राजाजी के विवेक से लेकर महादेव देसाई की सेवा तक—हर जीवन गीता के किसी न किसी शाश्वत सिद्धांत का सजीव उदाहरण है।
आज आवश्यकता नई क्रांति की नहीं, बल्कि नए चरित्र की है।
आज आवश्यकता नए नारों की नहीं, बल्कि नए कर्मयोगियों की है।
आज आवश्यकता नए संघर्षों की नहीं, बल्कि नई चेतना की है।
यदि भारत का प्रत्येक नागरिक अपने जीवन में गीता के केवल एक श्लोक को भी आचरण में उतार ले, तो परिवार बदल सकता है, समाज बदल सकता है और राष्ट्र भी नई ऊँचाइयों को प्राप्त कर सकता है।
इसी विश्वास के साथ यह विनम्र कृति पाठकों को समर्पित है।
गीता का प्रकाश कभी मंद नहीं पड़ता।
जो उसके आलोक में चलता है, वही स्वयं प्रकाश का स्रोत बन जाता है।
याद रखें—स्वाधीनता हमें हमारे पूर्वजों ने दी; उसे सुरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है। गीता हमें यही सिखाती है—कर्तव्य ही सर्वोच्च पूजा है। आइए, हम भी अपने जीवन में एक गीता-योद्धा बनने का संकल्प लें।
अंतिम संदेश
गीता केवल एक धर्मग्रंथ नहीं, बल्कि कर्तव्य, साहस, त्याग, नेतृत्व और राष्ट्रनिर्माण का शाश्वत संविधान है। इन अठारह स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने जीवन से सिद्ध किया कि जब गीता का संदेश जीवन में उतरता है, तब साधारण मनुष्य भी इतिहास का निर्माता बन जाता है।
यही इस पुस्तक का संदेश है।
यही भारत की आत्मा है।
यही गीता का अमर प्रकाश है।
बंसी तो कृष्ण की बजती रहेगी
बंसी तो कृष्ण की बजती रहेगी, भारत को गीता सुनाती रहेगी।
स्वाधीनता-वीरों की अमर गाथाएँ, पीढ़ी से पीढ़ी गुनगुनाती रहेगी॥
बिस्मिल का निष्काम कर्म पुकारे, नेताजी कर्मयोग सँवारे।
सावरकर का अभय अमर है, भगत का ज्ञान प्रखर-प्रखर है।
आजाद का आत्मबल जगमग है, रासबिहारी का धैर्य प्रबल है।
बंसी तो कृष्ण की बजती रहेगी…
श्यामजी धर्म जगाएँगे, हरदयाल लोकसंग्रह गाएँगे।
लाजपत सेवा का दीप जलाएँ, गोखले आदर्श-पथ दिखाएँ।
राजेंद्र विनय सिखलाते हैं, सरदार अखंडता गाते हैं।
बंसी तो कृष्ण की बजती रहेगी…
राजाजी का बुद्धियोग निराला, महादेव का सेवा-उजियाला।
कृपलानी समभाव सिखाएँ, नरेंद्र देव श्रद्धा जगाएँ।
खुदीराम का अमर समर्पण, भारत का है दिव्य वंदन।
बंसी तो कृष्ण की बजती रहेगी…
गीता का संदेश अमर रहेगा, भारत सदा प्रखर रहेगा।
कर्तव्य ही पूजा कहलाएगी, मानवता मुस्कुराएगी।
बंसी तो कृष्ण की बजती रहेगी, भारत को गीता सुनाती रहेगी।
स्वाधीनता-वीरों की अमर गाथाएँ, युग-युग तक प्रेरणा जगाती रहेंगी॥
