हमारा अहंकार हमारे भीतर की कमजोरी को छिपाता है
जीवन को दो प्रकार से देखा जा सकता है। पहला दृष्टिकोण यह है कि जीवन का केंद्र “मैं” हूँ और शेष समस्त जगत उसकी परिधि है। अर्थात् कील मैं हूँ और समूचा संसार मेरे चारों ओर घूम रहा है। यही अज्ञान की मनोदशा है। अज्ञानी स्वयं को केंद्र में रखता है और संपूर्ण जगत को अपनी परिधि पर देखता है। उसे लगता है कि सब कुछ उसी के लिए हो रहा है और उसी के कारण हो रहा है। वह न तो यह देख पाता है कि प्रकृति के गुण कार्य कर रहे हैं और न ही यह समझ पाता है कि परमात्मा की विराट व्यवस्था ही सबका संचालन कर रही है। उसके लिए हर कार्य का कर्ता केवल “मैं” हूँ।
उसकी स्थिति उस छिपकली के समान है, जिसके बारे में एक कथा कही जाती है। एक छिपकली राजमहल की छत से लटकी हुई थी और भयभीत थी कि यदि वह हट गई, तो कहीं पूरी छत ही न गिर जाए। उसे भ्रम था कि उसी के कारण छत टिकी हुई है। यही अहंकार की स्थिति है।
कोपरनिकस से पहले लोग मानते थे कि पृथ्वी पूरे ब्रह्मांड का केंद्र है और सूर्य, चंद्रमा तथा सभी ग्रह-नक्षत्र पृथ्वी के चारों ओर घूमते हैं। कोपरनिकस ने इस धारणा को बदलते हुए कहा कि वास्तविकता इसके विपरीत है—पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। यह केवल वैज्ञानिक खोज नहीं थी, बल्कि मनुष्य के अहंकार पर भी एक गहरा आघात था।
धक्का इस बात का नहीं था कि सूर्य किसके चारों ओर घूमता है, बल्कि इस बात का था कि जिस पृथ्वी पर मनुष्य रहता है, वह स्वयं भी किसी और के चारों ओर घूमती है। मनुष्य ने हजारों वर्षों तक अपने अहंकार के इर्द-गिर्द पूरे संसार को घुमाया था और अचानक उसका यह भ्रम टूट गया।
इसी संदर्भ में जॉर्ज बर्नार्ड शॉ का एक व्यंग्य प्रसिद्ध है। उन्होंने मजाक में कहा कि कोपरनिकस की बात गलत है; सूर्य ही पृथ्वी की परिक्रमा करता है। जब किसी ने उनसे प्रमाण माँगा, तो उन्होंने उत्तर दिया—”जिस पृथ्वी पर बर्नार्ड शॉ रहता है, वह किसी की परिक्रमा कैसे कर सकती है?” यह व्यंग्य मनुष्य के अहंकार पर गहरी चोट करता है।
अहंकारी मनुष्य सदैव स्वयं को केंद्र मानता है। उसे लगता है कि समस्त जगत उसी के चारों ओर घूम रहा है। किंतु ज्ञानी की दृष्टि बिल्कुल विपरीत होती है। वह कहता है कि यदि कोई केंद्र है, तो वह परमात्मा है; हम तो केवल उसकी विराट व्यवस्था की परिधि पर उठती-गिरती लहरें हैं।
ज्ञानी जानता है कि हमें अपने जन्म का कारण नहीं मालूम, मृत्यु का समय नहीं मालूम, श्वास भीतर क्यों आती है और बाहर क्यों जाती है—यह भी नहीं मालूम। जब अपने अस्तित्व का मूल रहस्य ही अज्ञात है, तब कर्तापन का अहंकार कैसा?
वह समझता है कि समस्त कर्म विराट सत्ता के हैं। हम केवल माध्यम हैं। इसलिए हार-जीत, सुख-दुख, प्रेम-घृणा, युद्ध-शांति—जो कुछ भी संसार में घटित हो रहा है, वह प्रकृति के गुणों के माध्यम से घटित हो रहा है। जो इस सत्य को जान लेता है, उसके जीवन में अनासक्ति का उदय हो जाता है। फिर आसक्ति का विष उसके भीतर नहीं रहता।
एक प्रसिद्ध ज़ेन कथा है। रिंझाई नामक एक ज़ेन फकीर गाँव से गुजर रहे थे। पीछे से किसी व्यक्ति ने उन्हें लकड़ी से मारा और भाग गया। भागते समय उसकी लकड़ी वहीं गिर गई। रिंझाई ने लकड़ी उठाई और उसके पीछे दौड़ते हुए कहा—”भाई, अपनी लकड़ी तो लेते जाओ।”
पास खड़े एक दुकानदार ने आश्चर्य से पूछा, “जिसने तुम्हें मारा, उसी की लकड़ी लौटाने दौड़ रहे हो?”
रिंझाई ने उत्तर दिया, “एक दिन मैं वृक्ष के नीचे लेटा था। उसकी एक शाखा टूटकर मेरे ऊपर गिर गई थी। तब मैंने वृक्ष से कोई शिकायत नहीं की। आज लकड़ी इस व्यक्ति के हाथ से मेरे ऊपर गिरी है, तो उससे क्यों शिकायत करूँ?”
दुकानदार को बात समझ में नहीं आई। तब रिंझाई ने एक और उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, “एक बार मेरी नाव से एक खाली नाव टकरा गई थी। मैंने कुछ नहीं कहा। दूसरी बार एक नाव, जिसमें नाविक बैठा था, मेरी नाव से टकराई। मेरे साथी ने उसे गालियाँ देनी शुरू कर दीं। मैंने उससे पूछा—यदि नाव खाली होती, तब भी क्या तुम गाली देते?”
रिंझाई का संकेत यही था कि नाव भी उसी विराट व्यवस्था का भाग है और उसे चलाने वाला मनुष्य भी। फिर एक को क्षमा और दूसरे के प्रति क्रोध क्यों?
वास्तव में जब कोई व्यक्ति क्रोध में होता है, तब उसके शरीर में हार्मोन और रासायनिक परिवर्तन होते हैं। उसके रक्त में ऐसे रसायन प्रवाहित होते हैं जो उसके विवेक को ढक देते हैं। जैसे शराबी का व्यवहार शराब के प्रभाव में बदल जाता है, वैसे ही क्रोधग्रस्त व्यक्ति का व्यवहार भी उसके भीतर घट रही जैविक प्रक्रियाओं से प्रभावित होता है। अंतर केवल इतना है कि शराब बाहर से आती है और क्रोध की “मदिरा” भीतर से उत्पन्न होती है।
इसी सत्य को भगवद्गीता के तृतीय अध्याय के 28वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥ (गीता 3.28)
भावार्थ:
हे महाबाहो! जो पुरुष गुणों और कर्मों के विभाग का तत्त्व जानता है, वह यह समझता है कि गुण ही गुणों में प्रवृत्त हैं; इसलिए वह आसक्त नहीं होता।
भगवान श्रीकृष्ण का संदेश है कि जो व्यक्ति जीवन के इस रहस्य को समझ लेता है, वह अनासक्त हो जाता है। वह अहंकार के बोझ से मुक्त हो जाता है।
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद कहते हैं कि हमारा अहंकार वास्तव में हमारे भीतर की कमजोरी को छिपाने का उपाय है। भीतर हम स्वयं को असुरक्षित और अपूर्ण अनुभव करते हैं, इसलिए बाहर पद, प्रतिष्ठा, धन, सत्ता, बड़ा घर या अन्य उपलब्धियों के सहारे स्वयं को सिद्ध करना चाहते हैं। हमें लगता है कि इन बाहरी साधनों से ही हमारा महत्व सिद्ध होगा।
किन्तु जिसके भीतर वास्तविक सामर्थ्य होती है, उसे बाहरी प्रमाणों की आवश्यकता नहीं होती। महावीर निर्वस्त्र खड़े होकर भी अपने तेज से पहचाने जाते हैं। गौतम बुद्ध भिक्षापात्र लेकर गाँव-गाँव घूमते थे, फिर भी उनका व्यक्तित्व किसी राजसत्ता का मोहताज नहीं था।
यही सच्चे ज्ञान की पहचान है—जहाँ भीतर का प्रकाश जाग जाता है, वहाँ अहंकार की आवश्यकता स्वयं समाप्त हो जाती है।
