कुरुक्षेत्र स्थित जीओ गीता द्वारा संचालित गीता ज्ञान संस्थान की ओर से आयोजित सात दिवसीय गीता महोत्सव का आयोजन 19 से 25 दिसंबर के बीच किया गया। महोत्सव के दूसरे दिन गुरुग्राम विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मार्कण्डेय आहूजा ने ‘चिकित्सकों के लिए गीता’ विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि गीता अंधकार से प्रकाश, असत्य से सत्य और मृत्यु से मोक्ष की ओर ले जाने वाली दिव्य प्रेरणा है।
उन्होंने कहा कि गीता हमें सच्चे अर्थों में जीना सिखाती है, भटके हुए व्यक्ति को सही मार्ग दिखाती है तथा भय, भ्रम और शोक को दूर करती है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए मार्ग पर अर्जुन की तरह चलना चाहिए। मनुष्य को बिना फल की इच्छा किए अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ करना चाहिए।
डॉ. आहूजा ने कहा कि कर्म करते समय यदि मन में फल की इच्छा हो, तो व्यक्ति पूर्ण निष्ठा के साथ कर्म नहीं कर पाता। निष्काम कर्म ही सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। अतः मन लगाकर अपना कार्य करते रहना चाहिए तथा फल देने, न देने अथवा कितना देने का निर्णय परमात्मा पर छोड़ देना चाहिए, क्योंकि वही समस्त सृष्टि का पालनकर्ता है।
उन्होंने कोविड महामारी के दौरान चिकित्सकों द्वारा अपनी जान की परवाह किए बिना की गई सेवा को सराहनीय, वंदनीय और दिव्य बताया। उन्होंने कहा कि आने वाला समय मानवता के लिए किए गए इस कल्याणकारी कार्य को कभी नहीं भूलेगा। यह वास्तव में “योगः कर्मसु कौशलम्” की पराकाष्ठा है।
डॉ. आहूजा ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता विश्व के उन चुनिंदा ग्रंथों में से एक है, जिन्हें आज भी सबसे अधिक पढ़ा जाता है। यह मनुष्य को जीवन-पथ पर कर्म और अनुशासन के साथ चलने की प्रेरणा देती है। विदेशों में भी गीता आज शोध का महत्वपूर्ण विषय बनी हुई है। गीता में जीवन की प्रत्येक समस्या का समाधान निहित है। यदि हम प्रतिदिन इसके श्लोकों का अध्ययन और मनन करें, तो अनेक समस्याओं का समाधान स्वयं खोज सकते हैं।
उन्होंने कहा— “गीता उपदेश नहीं, उपचार है; गीता मानवता की मुस्कान है।”
भारतीय संस्कृति में गीता का स्थान सर्वोच्च है। हमारे अंतरतम में गीता के श्लोक वीणा की झंकार की भाँति गूँजते हैं। घर-घर में जीवन-सुधार संबंधी जो भी उपदेश, नीति और मूल्य दिए जाते हैं, उनमें कहीं न कहीं गीता का प्रकाश अवश्य दिखाई देता है। इस अवसर पर अनेक विश्वविद्यालयों के कुलपति, चिकित्सक और चिंतकों ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
डॉ. नरेश त्रेहन के विचार
मेदांता अस्पताल के निदेशक एवं प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ पद्मभूषण डॉ. नरेश त्रेहन ने बताया कि जब गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द महाराज ने उनसे ‘गीता और चिकित्सा’ विषय पर बोलने का आग्रह किया, तब उन्होंने इस विषय पर गहन अध्ययन किया। इससे उन्हें अनुभव हुआ कि जब कोई हृदय रोगी उपचार के लिए चिकित्सक के पास आता है, तो वह केवल बीमारी ही नहीं, बल्कि मानसिक, पारिवारिक और व्यावसायिक चिंताओं का बोझ भी साथ लाता है।
उन्होंने कहा कि गीता का अध्ययन करने के बाद उन्होंने रोगियों की बीमारी के साथ-साथ उनके परिवार, कार्यक्षेत्र और अन्य समस्याओं को भी ध्यान से सुनना शुरू किया। इससे रोगियों को यह अनुभव होने लगा कि चिकित्सक ने केवल उनकी बीमारी ही नहीं, बल्कि उनकी पीड़ा को भी समझा है। इस दृष्टिकोण ने उनके अपने व्यवहार में भी सकारात्मक परिवर्तन किया।
डॉ. त्रेहन ने कहा कि “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” की भावना से किया गया कार्य समाज की ऐसी अमूल्य संपदा बनता है, जो भौतिक संपदा से कहीं अधिक फलदायी होती है।
डॉ. अमिता बिड़ला के विचार
प्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अमिता बिड़ला, जो लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिड़ला की धर्मपत्नी हैं, ने कहा कि वे लंबे समय से जीओ गीता से जुड़ी हुई हैं। गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द जी की प्रेरणा से उन्होंने गीता का अध्ययन प्रारंभ किया।
उन्होंने कहा कि प्रतिदिन एक श्लोक पढ़ने और उसका मनन-चिंतन करने से उन्हें जीवन का उद्देश्य समझ में आया और वे स्वार्थ से परमार्थ की यात्रा की ओर अग्रसर हुईं। स्वामी जी से हुई भेंट का उनके जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा और उनकी जीवनशैली में अनेक मूलभूत परिवर्तन आए।
स्वामी ज्ञानानन्द महाराज का संदेश
गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द महाराज ने कहा कि गीता धर्म और अध्यात्म का अमूल्य काव्य है। यदि सभी शास्त्रों का सार एक स्थान पर मिलता है, तो वह स्थान गीता है। गीता रूपी ज्ञान-गंगोत्री में स्नान करके अज्ञान दूर होता है और मनुष्य सच्चे ज्ञान को प्राप्त करता है।
उन्होंने बताया कि उन्होंने चिकित्सकों के लिए एक विशेष पुस्तिका की रचना भी की है, जिसमें गीता के अनेक प्रेरक श्लोक संकलित हैं। ये श्लोक चिकित्सकों को न केवल उनके व्यावसायिक जीवन में प्रेरित करते हैं, बल्कि तनावमुक्त रहने, रोगियों के प्रति संवेदनशील बनने तथा चिकित्सक और रोगी के बीच मधुर संबंध स्थापित करने की दिशा भी दिखाते हैं।
स्वामी जी ने कहा कि गीता का पहला शब्द ‘धर्म’ और अंतिम शब्द ‘मम’ है। इसलिए गीता हमें स्वधर्म का बोध कराती है। यदि कोई व्यक्ति इन दो शब्दों के मर्म को समझ ले, तो उसके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आ सकता है।
उन्होंने कहा कि अर्जुन की व्यथा हम सबकी व्यथा है और महाभारत हमारे जीवन का प्रतिदिन घटित होने वाला संघर्ष है। गीता किसी एक धर्म विशेष की पुस्तक नहीं, बल्कि समस्त प्राणीमात्र के कल्याण का ग्रंथ है। आज विश्व जिस हिंसा और विनाश के वातावरण से गुजर रहा है, उससे बाहर निकलने का मार्ग गीता की दिव्य प्रेरणाओं में निहित है।
उन्होंने चिकित्सकों से आह्वान किया कि वे निर्माणाधीन संस्थान के अनुसंधान केंद्र से जुड़ें और गीता के प्रत्येक शब्द पर शोध कर मानवता को नई दिशा प्रदान करें।
राजीव अरोड़ा के विचार
हरियाणा सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव श्री राजीव अरोड़ा ने कहा कि यह गीता का एक नया आयाम है और चिकित्सा क्षेत्र में इसकी उपयोगिता प्रेरणादायक है। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन निरंतर होते रहने चाहिए, क्योंकि गीता की शिक्षाएँ कठिन परिस्थितियों में चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों का मनोबल बढ़ाने का कार्य करती हैं।
उन्होंने सुझाव दिया कि गीता ज्ञान संस्थान हरियाणा सरकार के सहयोग से ऐसे सेमिनार आयोजित करे, ताकि अधिक से अधिक स्वास्थ्यकर्मी गीता की शिक्षाओं से प्रेरणा प्राप्त कर सकें।
कार्यक्रम का मंच संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सुदर्शन चुघ ने किया। सेमिनार का समापन उनके इन प्रेरक शब्दों के साथ हुआ—
आई जब यह महामारी, सबने जब हिम्मत हारी, / संकट की ऐसी घड़ी में सम्भाली इन्होंने जिम्मेदारी। / ऐसे कर्मनिष्ठ, गीतानिष्ठ लोगों पर तुम अभिमान करो, / निष्काम कर्मी चिकित्सकों का तुम सम्मान करो, सम्मान करो।
