अंधकार को दूर कर जो प्रकाश फैला दे…
अंधकार को दूर कर जो प्रकाश फैला दे, बुझी हुई आस में विश्वास जो जगा दे। जब लगे नामुमकिन कोई भी चीज, उसे मुमकिन बनाने की राह जो दिखा दे— वही है शिक्षा।
गीता ज्ञान संस्थान में “गीता जी की शिक्षा के क्षेत्र में भूमिका” विषय पर एक राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद जी महाराज के सान्निध्य में किया गया।
स्वामी ज्ञानानंद जी ने कहा कि यदि शिक्षा संस्कारविहीन होगी, तो भविष्य में अनेक समस्याएँ और प्रश्न खड़े होंगे, जिनका समाधान केवल गीता में उपलब्ध है। उन्होंने कहा कि गीता सर्वमान्य ग्रंथ है और विश्व का एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जिसकी जयंती मनाई जाती है।
उन्होंने बताया कि “जीओ गीता” का प्रयास है कि विद्यालयों के लिए गीता-आधारित पाठ्यक्रम तैयार किया जाए तथा ऐसी वर्णमाला विकसित की जाए जिसमें बच्चों को “अ से अर्जुन” और “आ से आर्यभट्ट” पढ़ने को मिले।
स्वामी जी ने कहा कि आज बच्चों को देश को लूटने वालों का इतिहास पढ़ाया जा रहा है, जबकि देश को बचाने वाले महापुरुषों का योगदान धीरे-धीरे विस्मृत होता जा रहा है। नैतिक मूल्यों को शिक्षा से लगभग अलग कर दिया गया है। गीता धर्म और जाति से ऊपर उठकर कर्म, संस्कार और मानवता का संदेश देती है। इसलिए प्रत्येक बच्चे—चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का हो—को संस्कारवान बनाना समय की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि जीओ गीता द्वारा नैतिक मूल्यों पर आधारित शिक्षा-पद्धति विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। गीता ज्ञान संस्थानम् की स्थापना का उद्देश्य यह है कि विश्वभर के चिंतक समय-समय पर यहाँ एकत्र हों और गीता से प्राप्त नई प्रेरणाओं एवं दिव्य दृष्टियों को विश्व के सामने प्रस्तुत करें, जिससे सम्पूर्ण मानवता लाभान्वित हो सके।
स्वामी जी ने कहा कि विश्व के चिंतकों और नीति-निर्माताओं ने यह सोचा था कि यदि पूरी दुनिया को शिक्षित कर दिया जाए, तो समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी। किंतु आज विश्व में चिंताएँ, अनाचार, दुराचार, व्यभिचार और अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं। मानवता त्राहि-त्राहि कर रही है।
उन्होंने कहा कि भौतिकवाद की अंधी दौड़ ने सुविधाएँ तो बढ़ा दी हैं, लेकिन मनुष्य सुख, संतोष और आनंद से दूर होता चला गया है। जीवन का संतुलन बिगड़ा है, तनाव बढ़ा है और शांति घटती जा रही है। ऐसे समय में हमें ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है जो “प्रोडक्ट निर्माण” नहीं, बल्कि “व्यक्ति निर्माण” करे।
स्वामी जी ने कहा कि केवल विज्ञान की खोजें ही पर्याप्त नहीं हैं; ज्ञान और चेतना के क्षेत्र में भी अनुसंधान को प्रोत्साहित करना होगा। उन्होंने जीवन के चार पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—का उल्लेख करते हुए कहा कि इनमें सबसे पहले धर्म को रखा गया है। यदि हम गीता के प्रथम श्लोक “धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे” का पुनः चिंतन करें और इसे “क्षेत्रे-क्षेत्रे धर्मं कुरु” अर्थात् प्रत्येक क्षेत्र में धर्माचरण करो के रूप में समझें, तो जीवन में नई दृष्टि और नए आयाम विकसित होंगे, जो इस धरती को प्रेम, शांति, भाईचारे और वात्सल्य से भर सकते हैं।
कुलपतियों एवं शिक्षाविदों के विचार
जीओ गीता के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं गुरुग्राम विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मारकंडेय आहूजा ने कहा कि गीता ज्ञान संस्थानम् में गीता के प्रत्येक आयाम पर शोध कार्य किया जाएगा। उन्होंने कहा कि स्वामी ज्ञानानंद जी का प्रत्येक श्वास गीता को समर्पित है।
डॉ. आहूजा ने कहा—
“गांडीव जमीन पर रखकर युद्ध की नैया पार नहीं होती, और गीता पढ़ने-सुनने वालों की कभी हार नहीं होती।”
उन्होंने बताया कि प्रत्येक इंद्रिय और उसके विषय से संबंधित राग-द्वेष को नियंत्रित करने के नियम होते हैं। मनुष्य को इनके वशीभूत नहीं होना चाहिए, क्योंकि ये आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में बाधक हैं।
उन्होंने कहा कि आज सूचना-क्रांति का युग है। एक बटन दबाते ही जानकारी मिल जाती है, लेकिन जानकारी ही प्रज्ञा नहीं होती। शिक्षा का उद्देश्य प्रज्ञावान मनुष्य का निर्माण करना है।
उन्होंने यह भी कहा कि बौद्धिक विकास के साथ-साथ मन की मजबूती पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। आचार्य द्रोण ने अर्जुन को सैन्यबल की शिक्षा तो दी, परंतु मनोबल की शिक्षा नहीं दी। यही कारण था कि जब अर्जुन युद्धभूमि में अपने स्वजनों को सामने देखता है, तो कह उठता है—
“सीदन्ति मम गात्राणि, मुखं च परिशुष्यति…”
यह मन के डांवाडोल होने का परिणाम था। इसलिए शिक्षा में मन को संयमित करने की शिक्षा भी अनिवार्य होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आज की शिक्षा बच्चों को केवल प्रतिस्पर्धी बना रही है, जबकि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य चरित्रवान और संतुलित व्यक्तित्व का निर्माण है।
अन्य वक्ताओं के विचार
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सोमनाथ सचदेवा ने कहा कि वे प्रारंभ से ही गीता ज्ञान संस्थानम् से जुड़े हुए हैं और कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, संस्थान के साथ मिलकर गीता पर शोध कार्य करेगा।
आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. बलदेव ने कहा कि गीता ज्ञान संस्थानम् में गीता की शिक्षाओं के अनुरूप गुरुकुल एवं नैचुरोपैथी महाविद्यालयों का केंद्र भी विकसित किया जाएगा।
चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. राधेश्याम ने कहा कि शिक्षा में संवेदनाएँ कहीं छूट न जाएँ, इसलिए गीता का समावेश शिक्षा में आवश्यक है।
समापन उद्बोधन
सेमिनार का समापन गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद महाराज जी के आशीर्वचनों से हुआ। स्वामी जी ने कहा कि इतने शिक्षाविदों का एक स्थान पर एकत्र होना इस बात का संकेत है कि शिक्षा की वर्तमान स्थिति को लेकर गहरी चिंता है और उसका समाधान गीता में खोजने का प्रयास किया जा रहा है।
उन्होंने कहा—
“समस्याओं का समाधान है गीता, इस देश की शान है गीता।”
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने गीता को विश्व के लिए भारत का अद्भुत और दिव्य उपहार बताया है। महात्मा गांधी ने भी गीता को जीवन के प्रत्येक प्रश्न का उत्तर माना था।
सेमिनार में गुरुग्राम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. के.सी. बांगड़ ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. संजीव शर्मा, डॉ. सुरेंद्र मोहन मिश्रा, डॉ. महासिंह पुनिया, कुलजिंद्र मोहन भट्ट, जिला शिक्षा अधिकारी अरुण आश्री, बाबू अनंत राम जनता कॉलेज के प्राचार्य डॉ. ऋषिपाल सहित अनेक शिक्षाविद उपस्थित रहे।
धन्यवाद प्रस्ताव जीओ गीता के राष्ट्रीय महासचिव श्री प्रदीप मित्तल ने प्रस्तुत किया। उन्होंने सभी से संस्थान से सकारात्मक रूप से जुड़ने का आह्वान करते हुए विश्वास व्यक्त किया कि स्वामी जी के नेतृत्व में विकसित हो रहा यह संस्थान करोड़ों लोगों की आशा और विश्वास का केंद्र बनेगा।
समापन काव्य
इंसानियत और पशुता के बीच का अंतर है शिक्षा, शांति, सुकून और खुशियों का मंत्र है शिक्षा। भेदभाव, छुआछूत और अंधविश्वास मिटाने का तंत्र है शिक्षा, जहाँ भी जली शिक्षा की चिंगारी, नकारात्मकता वहाँ से हारी। जिस समाज में हों शिक्षित सभी नर-नारी, सफलता और समृद्धि स्वयं बनें उनकी पुजारी। इसलिए आओ, शिक्षा का महत्व समझें हम, आओ, पूरे मानव समाज को गीतामय करें हम।
