परस्पर सहयोग ही सभी के सुख-समृद्धि की गारंटी है : गीता

तीसरे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥

अर्थात् तुम्हारे द्वारा संपन्न किए गए यज्ञों से देवता प्रसन्न होंगे और मनुष्यों तथा देवताओं के मध्य परस्पर सहयोग के परिणामस्वरूप सभी को सुख-समृद्धि प्राप्त होगी।

स्वर्ग के देवता अधिकारपूर्वक ब्रह्मांड के प्रशासन का संचालन करते हैं। परमपिता परमात्मा संसार की शासन-व्यवस्था के नियंत्रण और संचालन से संबंधित अपने कार्य उनके माध्यम से संपन्न कराते हैं। ये देवता भौतिक ब्रह्मांड के उच्च लोक, जिसे स्वर्ग या देवलोक कहा जाता है, में निवास करते हैं। देवता स्वयं भगवान नहीं हैं, बल्कि वे भी हमारी ही भाँति आत्माएँ हैं। उन्हें संसार के संचालन से संबंधित विभिन्न दायित्वों के निर्वहन हेतु विशिष्ट पद प्रदान किए गए हैं।

इसे हम अपने देश की शासन-व्यवस्था से समझ सकते हैं। जैसे संघीय शासन में गृह सचिव, रक्षा सचिव, वित्त सचिव, स्वास्थ्य सचिव आदि पद होते हैं। इन पदों पर नियुक्त अधिकारी निश्चित समय तक अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं। समयावधि पूर्ण होने अथवा शासन परिवर्तन के बाद अन्य व्यक्तियों को ये दायित्व सौंप दिए जाते हैं।

इसी प्रकार सृष्टि के संचालन के लिए भी अग्निदेव (अग्नि के अधिष्ठाता), वायु देव (वायु के अधिष्ठाता), वरुण देव (समुद्र के अधिष्ठाता), इन्द्र देव (देवताओं के राजा) आदि पदों की व्यवस्था की गई है। वेदों में इन देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अनेक यज्ञ, कर्मकाण्ड एवं धार्मिक विधियों का वर्णन मिलता है। इनके फलस्वरूप देवता लौकिक सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं।

किन्तु जब हम अपने सभी यज्ञ और कर्म भगवान की प्रसन्नता के लिए करते हैं, तब देवता भी स्वतः प्रसन्न हो जाते हैं। जैसे किसी वृक्ष की जड़ में जल देने से वही जल स्वतः उसकी शाखाओं, पत्तियों, पुष्पों और फलों तक पहुँच जाता है, उसी प्रकार भगवान की सेवा करने से समस्त देवता भी संतुष्ट हो जाते हैं।

इसी सिद्धांत को समझाने वाली एक प्रसिद्ध कहानी है, जिसे हम सभी ने बचपन में पढ़ा और सुना है। समय के साथ इस कहानी के अनेक नए रूप सामने आए, जो भगवान श्रीकृष्ण द्वारा लगभग 5100 वर्ष पूर्व प्रतिपादित “परस्पर सहयोग” के सिद्धांत की पुष्टि करते हैं।

एक बार खरगोश को अपनी तेज गति पर बहुत घमंड हो गया। वह जो भी मिलता, उसे दौड़ की चुनौती दे देता। अंततः कछुए ने उसकी चुनौती स्वीकार कर ली।

दौड़ आरंभ हुई। खरगोश तेज़ी से भागा और काफी आगे निकल गया। पीछे मुड़कर देखा तो कछुआ कहीं दिखाई नहीं दिया। उसने सोचा कि कछुए को यहाँ तक पहुँचने में बहुत समय लगेगा, इसलिए थोड़ा विश्राम कर लिया जाए। वह एक पेड़ के नीचे लेट गया और कब उसे नींद आ गई, उसे पता ही नहीं चला।

उधर कछुआ धीरे-धीरे, किंतु निरंतर चलता रहा। जब खरगोश की आँख खुली, तब तक कछुआ लक्ष्य रेखा के निकट पहुँच चुका था। खरगोश ने पूरी गति से दौड़ लगाई, परंतु बहुत देर हो चुकी थी। कछुआ दौड़ जीत गया।

इस कहानी से हमें बचपन में शिक्षा दी जाती थी—“धीमी लेकिन निरंतर गति सफलता दिलाती है।”

लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।

अपनी हार के बाद खरगोश ने आत्मचिंतन किया। उसे समझ में आया कि वह अपनी क्षमता के कारण नहीं, बल्कि अत्यधिक आत्मविश्वास और लापरवाही के कारण हारा था। उसने निश्चय किया कि अगली बार लक्ष्य तक पहुँचे बिना नहीं रुकेगा।

अगले दिन उसने पुनः कछुए को दौड़ की चुनौती दी। कछुए ने स्वीकार कर लिया।

इस बार खरगोश बिना रुके पूरी गति से दौड़ा और बहुत बड़े अंतर से जीत गया।

अब शिक्षा बदल गई—“निरंतरता अच्छी है, लेकिन यदि उसके साथ गति भी जुड़ जाए तो सफलता और अधिक सुनिश्चित हो जाती है।”

समय के साथ सोच और परिस्थितियाँ बदलती हैं। एक दिन कछुए ने विचार किया कि यदि दौड़ का मार्ग वही रहेगा, तो वह कभी खरगोश को नहीं हरा सकेगा। इसलिए उसने एक नई दौड़ का प्रस्ताव रखा और इस बार मार्ग स्वयं निर्धारित किया।

खरगोश तैयार हो गया।

दौड़ शुरू हुई। खरगोश तेज़ी से भागता हुआ आगे पहुँचा, लेकिन रास्ते में एक चौड़ी नदी आ गई। वह वहीं रुक गया, क्योंकि वह नदी पार नहीं कर सकता था।

कुछ देर बाद कछुआ वहाँ पहुँचा। उसने आराम से नदी पार की और लक्ष्य तक पहुँचकर दौड़ जीत ली।

इस बार शिक्षा मिली—“अपनी शक्तियों को पहचानिए और उसी के अनुसार अवसर चुनिए। सफलता अवश्य मिलेगी।”

उदाहरण के लिए, यदि आप एक अच्छे वक्ता हैं, तो आपको ऐसे अवसरों का लाभ उठाना चाहिए जहाँ अपनी वक्तृत्व-कला प्रदर्शित कर सकें। इससे आप अपने जीवन और कार्यक्षेत्र में शीघ्र उन्नति कर सकते हैं।

लेकिन कहानी अभी भी समाप्त नहीं हुई।

कई बार प्रतिस्पर्धा करने के बाद खरगोश और कछुआ अच्छे मित्र बन गए। वे एक-दूसरे की शक्तियों और सीमाओं को भली-भाँति समझने लगे।

दोनों ने विचार किया कि यदि वे एक-दूसरे की क्षमता का उपयोग करें, तो कोई भी दौड़ आसानी से जीत सकते हैं।

उन्होंने एक अंतिम दौड़ का निर्णय लिया, पर इस बार प्रतिद्वंद्वी बनकर नहीं, बल्कि एक टीम के रूप में।

दौड़ शुरू हुई। खरगोश ने कछुए को अपनी पीठ पर बैठाया और तेज़ी से नदी तक पहुँच गया। वहाँ कछुए ने खरगोश को अपनी पीठ पर बैठाकर नदी पार करा दी। नदी पार करते ही खरगोश ने फिर कछुए को उठाया और दोनों मिलकर लक्ष्य रेखा तक पहुँच गए।

उन्होंने रिकॉर्ड समय में दौड़ पूरी की।

उस दिन उन्हें जीत की जो प्रसन्नता मिली, वैसी प्रसन्नता उन्हें कभी अकेले जीतकर नहीं मिली थी।

अब शिक्षा यह बनी—

“टीमवर्क सदैव व्यक्तिगत प्रदर्शन से श्रेष्ठ होता है।”

मनुष्य चाहे कितना ही प्रतिभाशाली क्यों न हो, वह अकेले हर सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। निरंतर सफलता के लिए दूसरों की शक्तियों को पहचानना, उनका सम्मान करना और समयानुकूल सहयोग करना आवश्यक है।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि खरगोश और कछुआ दोनों ही अपनी-अपनी हार के बाद निराश होकर नहीं बैठे। खरगोश ने अधिक परिश्रम किया और कछुए ने अपनी रणनीति बदली। दोनों ने अपनी असफलता को सीख में बदल दिया।

गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानन्द जी कहते हैं—

“जब कभी आप असफल हों, तो या तो अधिक परिश्रम करें, या अपनी सोच और रणनीति में परिवर्तन लाएँ, अथवा दोनों करें। लेकिन कभी भी हार को अंतिम सत्य मानकर निराश न हों।”

बड़ी से बड़ी हार के बाद भी विजय प्राप्त की जा सकती है, यदि भगवान श्रीकृष्ण का यह अमर संदेश सदैव स्मरण रहे—

“परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।”

अर्थात् परस्पर सहयोग ही सभी के सुख-समृद्धि और परम कल्याण की वास्तविक गारंटी है।

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