अन्याय से लड़ने में संकोच नहीं: गीता

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हिंदू आस्था में अपने महत्व के साथ-साथ, भगवद्गीता ने संत ज्ञानेश्वर, महर्षि अरविंद, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, रामप्रसाद बिस्मिल और खुदीराम बोस जैसे महान व्यक्तित्वों को प्रेरित किया। वहीं विश्व पटल पर एल्डस हक्सले, हेनरी डेविड थोरो, जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर, राल्फ वाल्डो इमर्सन, कार्ल युंग, बुलेंट एजेविट, हरमन हेस्से, जॉर्ज हैरिसन, निकोला टेस्ला सहित अनेक विचारकों, संगीतकारों, लेखकों, वैज्ञानिकों, साहित्यकारों, मनोवैज्ञानिकों और क्रांतिकारियों को भी गहराई से प्रभावित किया।

सृष्टि का आधार कर्म है और अपने वर्तमान स्वरूप में कर्मयोग के सिद्धांत का प्रमुख स्रोत भगवद्गीता ही है।

आदि शंकराचार्य ने भगवद्गीता के विषय में कहा है—

“भगवद्गीता के स्पष्ट ज्ञान से मानव अस्तित्व के सभी लक्ष्य पूर्ण हो जाते हैं। भगवद्गीता वैदिक ग्रंथों की समस्त शिक्षाओं का प्रकट सार है।”

आचार्य रामानुज के अनुसार—

“भगवद्गीता भगवान श्रीकृष्ण द्वारा भगवान की भक्ति के विज्ञान को प्रकट करने के लिए कही गई है, जो समस्त आध्यात्मिक ज्ञान का सार है।”

सर्वोच्च भगवान श्रीकृष्ण के अवतार का प्रमुख उद्देश्य संसार को आसुरी एवं नकारात्मक प्रवृत्तियों से मुक्त करना था, जो आध्यात्मिक विकास में बाधक हैं। साथ ही उनका यह भी संकल्प था कि वे सदैव समस्त मानवता के लिए सुलभ रहें।

स्वामी विवेकानंद की भगवद्गीता में विशेष रुचि थी। कहा जाता है कि भगवद्गीता उनकी दो सर्वाधिक प्रिय पुस्तकों में से एक थी; दूसरी थी The Imitation of Christ

महात्मा गांधी के लिए “भगवद्गीता का निःस्वार्थ सेवा पर दिया गया बल” प्रेरणा का प्रमुख स्रोत था। गांधीजी ने कहा—

“जब मुझे संदेह घेर लेता है, जब निराशाएँ मेरे सामने आ खड़ी होती हैं और मुझे क्षितिज पर आशा की एक भी किरण दिखाई नहीं देती, तब मैं भगवद्गीता की ओर रुख करता हूँ। उसमें मुझे ऐसा कोई श्लोक मिल जाता है जो मुझे सांत्वना देता है, और मैं भारी से भारी दुःख के बीच भी मुस्कुराने लगता हूँ।”

श्री अरविंद के अनुसार—

“भगवद्गीता केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि मानव जाति का एक सच्चा धर्मग्रंथ है। यह एक जीवंत रचना है, जो प्रत्येक युग के लिए नया संदेश और प्रत्येक सभ्यता के लिए नया अर्थ प्रदान करती है।”

अंग्रेज़ी लेखक एल्डस हक्सले ने गीता को “मानव जाति के आध्यात्मिक विकास का सबसे व्यवस्थित ग्रंथ” कहा।

अमेरिकी भौतिक विज्ञानी एवं मैनहट्टन परियोजना के निदेशक जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने 1933 में संस्कृत सीखी और भगवद्गीता का मूल पाठ पढ़ा। बाद में उन्होंने इसे अपने जीवन-दर्शन को आकार देने वाली सबसे प्रभावशाली पुस्तकों में से एक बताया।

ओपेनहाइमर को बाद में स्मरण आया कि ट्रिनिटी परमाणु परीक्षण के विस्फोट को देखते समय उन्हें भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय का यह श्लोक याद आया—

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥ (11.12)

अर्थ: यदि आकाश में एक साथ हजारों सूर्य उदित हो जाएँ, तो उनका प्रकाश भी उस विराट स्वरूप के तेज के समान होगा।

वर्षों बाद उन्होंने बताया कि उस समय उन्हें एक और श्लोक भी स्मरण हुआ। उन्होंने कहा—

“हम जानते थे कि दुनिया पहले जैसी नहीं रहेगी। कुछ लोग हँसे, कुछ रोए और अधिकांश लोग मौन रहे। मुझे भगवद्गीता की वह पंक्ति याद आई, जिसमें भगवान अर्जुन से कहते हैं— ‘अब मैं लोकों का संहार करने वाला काल हूँ।'”

हेनरी डेविड थोरो ने लिखा—

“प्रत्येक सुबह मैं अपनी बुद्धि को भगवद्गीता के अद्भुत और ब्रह्मांडीय दर्शन में स्नान कराता हूँ, जिसकी तुलना में हमारी आधुनिक दुनिया और उसका साहित्य अत्यंत छोटा और तुच्छ प्रतीत होता है।”

जर्मन दार्शनिक हरमन ग्राफ कीसरलिंग ने भगवद्गीता को “विश्व साहित्य की सबसे सुंदर कृतियों में से एक” कहा।

हरमन हेस्से के अनुसार—

“भगवद्गीता का चमत्कार जीवन के ज्ञान का ऐसा सुंदर रहस्योद्घाटन है, जो दर्शन को धर्म में विकसित होने की क्षमता प्रदान करता है।”

राल्फ वाल्डो इमर्सन ने कहा कि गीता में उन सभी प्रश्नों का समाधान मिलता है जो मनुष्य को व्याकुल करते हैं।

विल्हेम वॉन हम्बोल्ट ने गीता को “विश्व की सबसे सुंदर और संभवतः किसी भी भाषा में उपलब्ध सर्वश्रेष्ठ दार्शनिक काव्य” बताया।

ब्रिटिश भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल वॉरेन हेस्टिंग्स ने लिखा—

“मैं गीता को महान मौलिकता, गहन तर्क, उत्कृष्ट अभिव्यक्ति और मानव जाति के सभी ज्ञात धार्मिक ग्रंथों में एक अनुपम कृति घोषित करने में संकोच नहीं करता।”

उल्लेखनीय है कि गीता का पहला अंग्रेज़ी अनुवाद उनकी प्रेरणा से चार्ल्स विल्किन्स ने किया था।

अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स अपने अंतरिक्ष अभियान में भगवद्गीता तथा उपनिषदों की एक प्रति साथ लेकर गई थीं।

रुडोल्फ स्टाइनर ने कहा—

“यदि हम भगवद्गीता जैसी उदात्त रचना को पूरी तरह समझना चाहते हैं, तो हमें अपनी आत्मा को उसके साथ जोड़ना होगा।”

भारत के 11वें राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम मुस्लिम होने के बावजूद भगवद्गीता का अध्ययन करते थे और उसके मंत्रों का उच्चारण भी करते थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भगवद्गीता को “दुनिया के लिए भारत का सबसे बड़ा उपहार” बताया है।

हॉलीवुड अभिनेता विल स्मिथ ने कहा—

“मैं लगभग 90 प्रतिशत भगवद्गीता के माध्यम से स्वयं को समझ पाया हूँ। मेरे भीतर के अर्जुन को दिशा मिली है।”

तुर्की के पूर्व प्रधानमंत्री बुलेंट एजेविट से जब पूछा गया कि साइप्रस में तुर्की सेना भेजने का साहस उन्हें कहाँ से मिला, तो उन्होंने उत्तर दिया—

“मुझे भगवद्गीता ने शक्ति दी। उसने सिखाया कि यदि कोई नैतिक रूप से सही है, तो उसे अन्याय से लड़ने में संकोच नहीं करना चाहिए।”

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