दूसरे अध्याय के 34वें श्लोक में भगवान कहते हैं—
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥ 2.34॥
अर्थात् लोग तुम्हें कायर और भगोड़ा कहेंगे। एक सम्मानित व्यक्ति के लिए बदनामी मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक होती है। सम्मानित लोगों के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है। क्षत्रिय-स्वभाव वाले लोगों के लिए आदर और सम्मान का विशेष महत्व होता है। उनके लिए अपमान मृत्यु से भी अधिक पीड़ादायक है। श्रीकृष्ण अर्जुन को इसकी याद दिलाते हैं, ताकि यदि वह श्रेष्ठ ज्ञान से प्रेरित न हो, तो कम से कम अपने सम्मान और कर्तव्य-बोध से प्रेरित हो सके।
दुनिया के अनेक समाजों में यह परंपरा रही है कि जो योद्धा कायरता के कारण युद्धभूमि से भाग जाता है, उसे समाज में तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। यदि अर्जुन अपने कर्तव्य से विमुख होता, तो यह उसके लिए अत्यन्त अपमानजनक स्थिति होती।
अकबर के दरबार की एक प्रसिद्ध कथा है। एक दिन दो युवा राजपूत दरबार में पहुँचे। वे तलवारें लिए हुए अकबर के सामने खड़े हो गए और बोले कि वे सेना में भर्ती होना चाहते हैं। अकबर ने सहज ही पूछ लिया, “तुम बहादुर हो, इसका कोई प्रमाण-पत्र लाए हो? मैं कैसे मानूँ कि तुम बहादुर हो?”
अकबर के इतना कहते ही दोनों ने अपनी तलवारें म्यान से निकाल लीं। अकबर कुछ समझ पाता, उससे पहले ही दोनों ने एक-दूसरे की छाती में तलवार भोंक दी। कुछ ही क्षणों में दोनों भूमि पर गिर पड़े और रक्त बहने लगा।
अकबर ने आश्चर्य से कहा, “यह क्या किया तुमने?”
उस समय दरबार में राजपूत सेनापति मानसिंह भी उपस्थित थे। उन्होंने कहा, “राजपूत से बहादुरी का प्रमाण माँगना ही उसके सम्मान का अपमान है। बहादुरी का कोई कागज़ी प्रमाण नहीं होता। उसका एकमात्र प्रमाण यह है कि व्यक्ति मृत्यु को भी तुच्छ समझता है।”
उन युवकों ने अपने प्राण देकर यह दिखा दिया कि उनके लिए अपमान सहना मृत्यु से भी कठिन था।
महाभारत में भी सम्मान और अपमान की भावना का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। एक प्रतियोगिता में प्रतिभागियों को अपने वंश का परिचय देना था। अर्जुन ने अपने राजवंश की घोषणा की। जब कर्ण की बारी आई, तो यदि वह अपने सारथि-पुत्र होने का परिचय देता, तो उसे अर्जुन के समकक्ष प्रतियोगिता में भाग लेने का अधिकार नहीं मिलता।
तभी दुर्योधन ने हस्तक्षेप किया और कर्ण को अंग देश का राजा घोषित कर दिया। कर्ण ने यह सम्मान स्वीकार किया और उसी दिन से वह दुर्योधन का आजीवन मित्र एवं समर्थक बन गया। जब कर्ण ने दुर्योधन से पूछा कि वह बदले में क्या चाहता है, तो दुर्योधन ने कहा, “मुझे तुम्हारी अटूट मित्रता चाहिए।”
अभिषेक के समय कर्ण के पिता भी वहाँ उपस्थित थे। भीम ने उनकी निम्न सामाजिक स्थिति का उपहास किया। अपने पिता के सार्वजनिक अपमान से कर्ण अत्यन्त आहत हुआ और उसके मन में पाण्डवों के प्रति वैर की भावना गहरी हो गई। यही अपमान उसके जीवनभर की मानसिक पीड़ा का कारण बना। बाद में जब श्रीकृष्ण ने उसे पाण्डवों का ज्येष्ठ भ्राता बताकर सम्राट बनने का प्रस्ताव दिया, तब भी कर्ण ने अपने साथ हुए अपमान को याद किया।
सीख
किसी को अपशब्द कहना, किसी का अपमान करना, किसी पर हाथ उठाना, किसी की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाना, किसी की शारीरिक बनावट का उपहास करना, जाति या सामाजिक स्थिति के आधार पर तिरस्कार करना, अथवा अपने बुजुर्गों और बड़ों का अनादर करना—इन सबके परिणाम गंभीर हो सकते हैं।
इसलिए किसी को अपमानित करने से पहले सौ बार विचार करना चाहिए। अपमानित व्यक्ति कभी-कभी अपने अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है। अतः हमें सदैव सम्मान, संवेदनशीलता और मर्यादा के साथ व्यवहार करना चाहिए।
