वीर विनायक दामोदर सावरकर
अभय, स्वधर्म और अदम्य संकल्प के गीता-योद्धा
अभय, स्वधर्म और अदम्य संकल्प के गीता-योद्धा
“जो राष्ट्र अपने स्वाभिमान की रक्षा नहीं करता, उसका अस्तित्व भी संकट में पड़ जाता है।”
“अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः…” (16.1)
भूमिका
जब भय पर विजय ही स्वतंत्रता की पहली सीढ़ी बन जाए!
इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनके जीवन को केवल घटनाओं से नहीं, बल्कि उनके अदम्य साहस से समझा जाता है। वीर विनायक दामोदर सावरकर ऐसे ही युगनायक थे। उनके लिए स्वतंत्रता कोई राजनीतिक सुविधा नहीं, बल्कि राष्ट्र का जन्मसिद्ध अधिकार थी।
यदि राम प्रसाद बिस्मिल निष्काम कर्म के प्रतीक थे और नेताजी कर्मयोग के, तो सावरकर अभय के प्रतीक थे।
भगवद्गीता दैवी गुणों की सूची का प्रारंभ ही “अभयम्” से करती है। यह कोई संयोग नहीं है। भयमुक्त मनुष्य ही धर्म, सत्य और राष्ट्र के लिए संघर्ष कर सकता है।
क्रांति का संकल्प
28 मई 1883 को महाराष्ट्र के भगूर में जन्मे सावरकर बचपन से ही तेजस्वी, अध्ययनशील और राष्ट्रभक्त थे। विद्यार्थी जीवन में ही उन्होंने विदेशी शासन के विरुद्ध संगठित क्रांति का विचार विकसित किया।
इंग्लैंड में रहते हुए उन्होंने इंडिया हाउस को क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बनाया और युवाओं में स्वतंत्रता की चेतना जगाई। उनके लिए राष्ट्रभक्ति केवल भावना नहीं थी; वह जीवन का व्रत थी।
गीता से सावरकर का संबंध
सावरकर भारतीय संस्कृति और शास्त्रों के गंभीर अध्येता थे। उनके लेखन में भगवद्गीता का अनेक स्थानों पर उल्लेख मिलता है। वे गीता को पलायन का नहीं, बल्कि कर्तव्य, साहस और धर्मयुक्त संघर्ष का ग्रंथ मानते थे। अंडमान की सेल्युलर जेल की अमानवीय यातनाओं के बीच भी उनका आत्मबल विचलित नहीं हुआ। यह वही मानसिक दृढ़ता है, जिसकी प्रेरणा गीता देती है।
गीता का अभय
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—
“अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः…” (16.1)
भावार्थ
दैवी गुणों में सबसे पहला गुण है—अभय, अर्थात् निर्भयता। सावरकर का संपूर्ण जीवन इस एक शब्द की व्याख्या प्रतीत होता है।
स्वधर्म का पालन
गीता कहती है—
“श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।” (3.35)
सावरकर ने सुविधा, सुरक्षा और व्यक्तिगत सुख का मार्ग नहीं चुना। उन्होंने अपने स्वधर्म—राष्ट्रसेवा—को चुना, चाहे उसके परिणामस्वरूप उन्हें दो-दो आजीवन कारावास और कालापानी का दंड ही क्यों न भुगतना पड़ा।
सेल्युलर जेल—कर्मयोग की तपशाला
अंडमान की सेल्युलर जेल में उन्हें अमानवीय यातनाएँ दी गईं। कोल्हू में बैल की तरह तेल पेरना, बेड़ियाँ, एकांत कारावास—इन सबके बीच भी उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया।
उन्होंने कविता लिखी, इतिहास लिखा, साथियों को प्रेरित किया और अपने मनोबल को टूटने नहीं दिया।
यही गीता का संदेश है—
“तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।” (3.19)
अर्थात् आसक्ति रहित होकर निरंतर अपने कर्तव्य कर्म का आचरण करो।
आज के भारत के लिए सावरकर का संदेश
आज साहस का अर्थ केवल युद्धभूमि में लड़ना नहीं है।
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सत्य बोलने का साहस।
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राष्ट्रहित में निर्णय लेने का साहस।
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कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने का साहस।
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स्वार्थ से ऊपर उठने का साहस।
यही आधुनिक अभय है।
गीता प्रेरणा—प्रमुख श्लोक
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16.1 — अभयम्।
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3.19 — आसक्तिरहित कर्म।
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3.35 — स्वधर्म।
मुख्य सिद्धांत: भयमुक्त मन ही महान कर्म कर सकता है।
सावरकर से सीखें
✓ विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग रहना।
✓ राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना।
✓ ज्ञान और कर्म का समन्वय करना।
✓ साहस को जीवन का आधार बनाना।
✓ कठिनाइयों को तपस्या में बदल देना।
इतिहास की आँखों से
सावरकर के समकालीनों ने उनके अद्भुत आत्मबल, संगठन-क्षमता और अध्ययनशीलता का उल्लेख किया है। सेल्युलर जेल में वर्षों तक कठोर यातनाएँ सहने के बाद भी उनका मानसिक संतुलन और राष्ट्र के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ। यही कारण है कि वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे दृढ़ संकल्प वाले क्रांतिकारियों में गिने जाते हैं।
क्या आप जानते हैं?
🔹 सावरकर को ब्रिटिश शासन ने दो-दो आजीवन कारावास (कुल 50 वर्ष) का दंड सुनाया था।
🔹 उन्होंने सेल्युलर जेल की दीवारों पर कीलों और कोयले से हजारों पंक्तियाँ लिखीं और उन्हें कंठस्थ कर लिया।
🔹 वे इतिहास, राजनीति, साहित्य और दर्शन के गंभीर अध्येता थे।
🔹 उन्होंने 1857 के संग्राम को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सिद्ध करने वाली प्रसिद्ध पुस्तक लिखी।
🔹 उनका जीवन असाधारण मानसिक दृढ़ता और संगठन-क्षमता का उदाहरण है।
यदि श्रीकृष्ण सावरकर से कहते…
“हे वीर!
तुमने भय को अपने निकट नहीं आने दिया।
तुमने विपत्ति को तपस्या बना दिया।
तुमने स्वधर्म के लिए कठिनतम मार्ग चुना।
जो निर्भय होकर धर्मयुक्त कर्म करता है, वही सच्चा वीर है।”
आज का संकल्प
“मैं भय या सुविधा के कारण अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटूँगा। सत्य, साहस और राष्ट्रहित को अपने जीवन का आधार बनाऊँगा।”
समापन
वीर सावरकर का जीवन हमें यह सिखाता है कि स्वतंत्रता का पहला चरण राजनीतिक नहीं, मानसिक होता है। जो मनुष्य भय से मुक्त हो जाता है, वही अन्याय का सामना कर सकता है। भगवद्गीता का “अभय” उनके जीवन में केवल एक आदर्श नहीं, बल्कि जीता-जागता सत्य था।
इसलिए वीर विनायक दामोदर सावरकर निःसंदेह “स्वाधीनता के गीता-योद्धा” थे और उनका गीता-मंत्र था—
“अभयं सत्त्वसंशुद्धिः…” (16.1)
