वाणी प्रबंधन समग्र व्यक्तित्व का प्रभावी अंग: गीता

प्रायः देखने में आता है कि यदि थोड़ी-सी भी स्थिति प्रतिकूल हो जाए, तो लोग तुरंत भड़क उठते हैं और अपशब्दों का प्रयोग करने लगते हैं। जैसे—यदि हवाई जहाज़ की उड़ान में देरी हो जाए, तो लोग काउंटर पर बैठी युवती से ऊँची-नीची बातें करने लगते हैं; या यदि सड़क पर किसी को साइड देने में थोड़ी देर हो जाए, तो पीछे से आने वाले वाहन चालक भी आक्रामक व्यवहार करने लगते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हमें रोज़ देखने-सुनने को मिलते हैं।

आजकल के कई नवयुवक मधुर भाषण को कमजोरी और ऊँची आवाज़ या कटु भाषा को साहस समझने लगे हैं। वे अध्यापकों से तो दूर, माता-पिता से भी अकड़कर बात करते हैं। यह प्रवृत्ति अत्यंत हानिकारक है। हमें अपना चरित्र उज्ज्वल बनाने के लिए मृदुभाषी बनना चाहिए। तभी हम समाज में समता, सहयोग, सहानुभूति, राष्ट्रीय एकता तथा विश्वबंधुत्व की भावना को आगे बढ़ा सकते हैं—जिनकी चर्चा हाल ही में भारत की अगुवाई में सम्पन्न G20 शिखर सम्मेलन में भी प्रमुखता से हुई।

मधुर वाणी और विनम्र व्यवहार के बिना न सहयोग संभव है, न समता और न ही सहानुभूति।

व्यक्ति के मधुर और कोमल शब्द जहाँ मित्रता को बढ़ाते हैं, वहीं कटु और कठोर वचन शत्रुता को जन्म देते हैं। मनुष्य-मनुष्य का संबंध वस्तुओं के आदान-प्रदान से अधिक शब्दों के आदान-प्रदान पर आधारित होता है। यदि आप अपने घर आए अतिथि का स्वागत कुछ मधुर शब्दों से करते हैं, तो साधारण सेवा भी उसे सुखद लगेगी; लेकिन यदि आप उत्तम व्यवस्था के बावजूद कटु वचन कह दें, तो सब व्यर्थ हो जाता है और सम्मान के स्थान पर आप द्वेष के पात्र बन जाते हैं।

कटु वचन कई बार अत्यंत अनिष्टकारी सिद्ध होते हैं। द्रौपदी के कटु वचनों ने दुर्योधन के हृदय को आहत किया और परिणामस्वरूप महाभारत जैसे भीषण युद्ध का मार्ग प्रशस्त हुआ। समाज में जिन महापुरुषों ने उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त की, वे सभी मृदुभाषी थे। भगवान बुद्ध ने अपने कट्टर विरोधियों से भी कभी कटु वचन नहीं कहे; अंततः वे उनके चरणों में आ गिरे। कौरवों के कटु वचनों का श्रीकृष्ण ने सदैव मृदु भाषा में उत्तर दिया। परशुराम के क्रोधपूर्ण वचनों के सामने भी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम मुस्कराते रहे और विनम्रता से उत्तर देते रहे। महात्मा गांधी शत्रुओं से भी मधुर भाषा में बात करते थे, यही कारण है कि उन्हें विश्वबंधु कहा जाता है।

कहा जाता है—
“तलवार का घाव भर जाता है, पर वाणी का घाव कभी नहीं भरता।”

गीता में भगवान श्रीकृष्ण वाणी के सदुपयोग का सुंदर मार्ग बताते हैं। 17वें अध्याय के 15वें श्लोक में कहा गया है—

“अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥”

अर्थात—ऐसी वाणी, जो किसी को उद्विग्न न करे, सत्य हो, प्रिय हो और हितकारी हो—वही वाणी का तप है।

प्रजापति मनु ने भी कहा है—
“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात्—एष धर्मः सनातनः।”

अर्थात सत्य को इस प्रकार कहना चाहिए कि वह प्रिय लगे; ऐसा सत्य नहीं कहना चाहिए जो दूसरों को आहत करे। और प्रिय लगने के लिए कभी असत्य नहीं बोलना चाहिए—यही सनातन धर्म है।

तुलसीदास जी कहते हैं—
“कागा काको धन हरै, कोयल काकूं देत।
तुलसी मीठे वचन से, जग अपना करि लेत॥”

कौआ किसी का कुछ नहीं लेता, फिर भी उसे लोग अपने घरों में बैठने नहीं देते; जबकि कोयल केवल अपनी मधुर वाणी के कारण सबको प्रिय लगती है। यह अंतर गुणों का है। यदि हमारे भीतर सद्गुण हैं, तो हम परायों को भी अपना बना सकते हैं।

मधुर वाणी ऐसा अमृत है, जो कठोर हृदय को भी पिघला देता है। यह ऐसा रसायन है, जो संबंधों को सुदृढ़ बनाता है; ऐसा मंत्र है, जो दूसरों के हृदय में स्थान दिलाता है। यह वह शक्ति है, जो जीवन और समाज दोनों को सुखी और शांत बना सकती है।

मधुर वाणी श्रोता और वक्ता—दोनों को आनंदित करती है। यह समाज में सम्मान, प्रेम, विश्वास और मर्यादा की आधारशिला है। इसके अभाव में समाज कलह, ईर्ष्या और द्वेष का केंद्र बन जाता है।

इसीलिए गीता का संदेश स्पष्ट है—
सत्य, प्रिय, अहिंसक और हितकारी वाणी का प्रयोग करें, क्योंकि यही समग्र व्यक्तित्व विकास का एक महत्वपूर्ण आधार है।

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