भाव तेरा भार मेरा : गीता के ृष्ण

एक बार एक व्यक्ति सिर पर सामान की गठरी रखे रेलगाड़ी में चढा़ । रेल चल पड़ी लेकिन वह व्यक्ति गठरी सिर पर ही रखे रहा । आसपास के यात्रियों ने जब कहा कि भाई क्यों सिर पर भार रखे हो , इतनी जगह है इसे नीचे रख लो। तपाक से उस व्यक्ति ने कहा, मैं अनावश्यक गाड़ी पर कोई भार नहीं डालना चाहता । जो इस व्यक्ति ने रेलगाड़ी म ें किया वही हम सब जीवन म ें करते हैं । परमात्मा की र ेलगाड़ी चल रही है और हम फालतू भार
अपने सिर पर उठाय े हैं । पंजाब की धरती के बाबा बुल्लेशाह ने तो यहाँ तक कहा- क्यों पढ़ना ऐं गड्ड किताबाँ दी, क्यों चाना ऐं प ंड अजाबा ँ दी,

 

हुण होयो ं शकल जलादाँ दी, अग्गे पैंडा म ुशकल भारा ए। इक अलफ पढ़ो छुटकारा ए। गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद के साथ चार वर्ष तक 1500 एपिसोड टेलीविजन पर गीता संवाद के किए। जब गीता क े नौवें अध्याय के 22वे ं श्लोक पर चर्चा हो रही थी तो उन्होंने एक सच्ची घटना का वर्णन किया जिसे सुधि पाठका े के संग साँझा कर रहा हू ँ । दक्षिण भारत म ें अर्जुनाचार्य और उनकी पत्नी भगवान के अत्य ंत सरल एवं विनम्र भक्त थे। वे एक छोटी सी झोपड़ी म ें रहते थे और प्रतिदिन सुबह की ड्यूटी के बाद गाँव जाते थे और भिक्षा माँगते थे।
नियमानुसार वह केवल तीन घरों में जाकर भिक्षा मांगता था। वह अपने और अपनी पत्नी के जीवनयापन के लिए पर्याप्त भिक्षा स्वीकार करते थे।वह भगवदगीता पर एक भाष्य लिख रह े थे और प्रतिदिन घंटों पढ ़न े और लिखन े म ें बिताते थे। एक दिन वह इसम ें इतना खा े गया कि खाना लाने क े लिए गांव जाना ही भूल गया। च ूँकि दोपहर हो चुकी थी, गाँव की महिलाएँ आराम कर रही थीं और एक भी घर में खाना नहीं बचा था। इसलिए वह खाली हाथ लौट आय े. एक बार फिर वह भगवत गीता पढ़ने बैठा। नवम अध्याय श्लोक 22 म ें भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

 

अनन्याश चि ंतान्तो माम ् ये जनाः पर्य ुपासते तेषाम्। नित्यअभिय ुक्तानाम् योग-क्षेमं वहाम्य अहम्।।

 

‘‘लेकिन जो लोग सदैव अनन्य भक्ति से मेरी पूजा करते है ं, मेरे दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हैं, मैं उनके लिए जो कमी है उसे प ूरा करता हूं, और जा े उनके पास है उसे मैं सुरक्षित रखता हू ं।‘‘ अर्जुनाचार्य अंतिम शब्दों पर गहराई से विचार करने लगे और उन्हें वे सही नहीं लग े।

 

भगवान क ैसे कह सकत े हैं, ‘‘वाह्म्या अहम्‘‘ – म ैं व्यक्तिगत रूप से धारण करता हूँ?

 

उसन े पंक्ति कुर ेदी – ‘‘योग क्षेम वहाम्यहम्‘‘ और फिर उसने अपनी पत्नी से कहा कि वह स्नान क े लिए नदी पर जा रहा है। इसी बीच दो लड़क े (कृष्ण और बलराम) प्रकट हुए और ढेर सारा चावल, सब्जियां, फल और मक्खन लके र आए और अर्जुनाचार्य की पत्नी को सौंप दिया।वह उनके खूबसूरत च ेहरा ें से आश्चर्य चकित थी और इसलिए उसने उनसे प ूछा कि व े कौन थे। उन्होंने खुद को उनक े पति के शिष्यो ं के रूप म ें पेश किया और कहा कि वे उनके आद ेश के अनुसार य े प्रावधान लाए ह ैं।वह बहुत आभारी और ख ुश थी कि अब वह अपन े भूखे पति के लिए कुछ बना सकती है, जब लड़क े जाने लग े तो उसने उनके शरीर के पीछे चोट के निशान द ेखे तो वह हैरान रह गई। उसने उनसे पूछाः हे सुन्दर बालकों, तुम्हार े साथ ऐसा किसने किया? उन्होंने उसे बताया कि उसका पति उनसे बहुत म ेहनत करवाता है और बात नही ं मानने पर उन्हे ं पीटता है। वह उनकी बात पर विश्वास नहीं कर पा रही थी। लेकिन वह उनके लिए बहुत दुखी हुई और दर्द से राहत पाने के लिए उनकी पीठ पर चंदन का लेप लगाया और वे तुर ंत चल े गए। जब अर्जुनाचार्य घर लौट े तो उनकी पत्नी उन पर बह ुत क्रोधित हुई। वह उससे बात भी नहीं करना चाहती थी। अर्जुनाचार्य ने उसस े प ूछाः तुम म ुझसे बात क्यों नहीं करना चाहती? क्या मैंने तुम्हे ं चोट पहुंचाई है? ‘आप छा ेटे बच्चों को नुकसान पह ुंचा रह े हैं!‘ उसकी पत्नी ने उत्तर दिया। कैसे? अर्जुनाचार्य न े पूछा। जब उसने सुना कि उसकी पत्नी न े उसस े क्या कहा, तो उसे एहसास हुआ कि व े दोनों लड ़क े कृष्ण आ ैर बलराम थे। वह अंदर भागा जहां उसकी भगवद गीता पड़ी थी और उसने देखा कि उसके श्ला ेक पर कलम के निशान गायब हो गए थे। वह भगवान के वचन पर संदहे करने के कारण रोने लगा और बोला, ‘‘या ेगक्षेम ं वहाम्य अहम्!‘‘ ये सच है।

 

भक्ता ें का उद्धार करन े आप स्वय ं आत े हैं। ओह ! कृपया मुझे माफ करें‘‘। उसकी पत्नी का े इस बात का दुःख हुआ कि वह उन्हे ं आमने-सामने देखने के बावजूद नहीं पहचान पाई। लेकिन अर्जुनाचार्य यह सोचकर बहुत प्रसन्न हुए कि उनकी पत्नी को कृष्ण और बलराम के प्रत्यक्ष दर्शन हुए। अर्जुनाचार्य ने उन्ह ें सांत्वना देते हुए कहा, “अब मुझे समझ आ गया ह ै कि भगवान कृष्ण आ ैर भगवदगीता में कोई अंतर नहीं ह ै। भगवद्गीता पर चिल्लाकर मैं भगवान कृष्ण के शरीर को चीख रहा था। और भगवान सत्य ह ै, वह अपने भक्तों का ख्याल रखता है। वह व्यक्तिगत रूप स े उनक े पास जो क ुछ है उसे वहन करते ह ैं और जो कुछ उनके पास
नही ं है उसे वह प्रदान करते हैं।‘‘

 

नन्य भाव हा े प्रभु के प्रति तो हमारा भार भी प्यार से उठात े हैं
ये ग ्रन्थ नहीं कृष्ण की जान है, जिसे भगवद् गीता कहते ह ै !!.

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