जीवन में सही निर्णय लेना सिखाती है गीता

प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में कई निर्णय लेने पड़त े हैं। ये निर्णय हमारे जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं। सही निर्णय हमें सफलता की बुलंदियों तक पहुंचा सकते हैं। वहीं गलत निर्णय सफलता की ऊंचाइयों से हमें जमीन पर भी ला सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में निर्णय लेने के कुछ नियम बताए हैं, जिन्हें अपनाकर हर कोई अपने जीवन में बेहतर निर्णय ले सकता है। श्रीमद्भगवद्गीता एक ऐसा धार्मिक ग्रंथ है जो हर इंसान के जीवन को एक सही दिशा दे सकती है श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं कि हमें अपने मस्तिष्क को संतुलित करके चलना चाहिए। इसलिए कोई भी निर्णय तब नहीं लेना चाहिए जब हम बहुत ज्यादा खुश या दुखी हैं। हमेशा शांत मन से सोचेंः भगवान कृष्ण चिंतित अर्जुन से कहते हैंः

“अर्जुन, निस्संदेह मन को वश में करना बहुत कठिन है। हालाँकि, इसे निरंतर अभ्यास

और वैराग्य द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है। (6ः35)

भगवान कृष्ण ने संपूर्ण भगवद्गीता में मन और विचारों को अत्यधिक महत्व दिया है। भगवान कृष्ण के अनुसार, पहला कदम स्पष्ट, शांत और एकत्रित दिमाग विकसित करके किसी भी स्थिति पर स्पष्टता हासिल करना है। एक तरीका है आत्मनिरीक्षण, दसू रा तरीका है अपने आप को उस स्थिति से दरू करना – शारीरिक रूप से नहीं बल्कि मानसिक रूप से – जहां आप इसे एक बाहरी व्यक्ति के रूप में देखते हैं और इसके बारे में विहंगम दृष्टि रखते हैं।हम हमेशा काम पर या घर पर हमारे साथ घटित हुई किसी भी चीज को दोबारा देख सकते हैं और कल्पना कर सकते हैं कि अगर हमने कुछ चीजों को जो घटित हुआ उससे बिल्कुल अलग तरीके से किया होता तो क्या होता। इस तरह जो कुछ हुआ उसके बारे में विलाप करने के बजाय, हम जो हुआ उस पर नियंत्रण रखेंगे और भविष्य की घटनाओं पर भी नियंत्रण रखेंगे।

गीता के अनुसार अर्जुन युद्ध नहीं लड़ना चाहते थे, क्योंकि उसे अपने गुरु और भाइयों को युद्ध खोने का डर था।  परंतु श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध लड़ने का मार्ग दिखाया। इसलिए व्यक्ति को भावना में बहकर कोई भी निर्णय नहीं लेना चाहिए। क्योंकि भावनाएं तात्कालिक होती हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं कि हमें अपने मस्तिष्क को संतुलित करके चलना चाहिए। इसलिए कोई भी निर्णय तब नहीं लेना चाहिए जब हम बहुत ज्यादा खुश या दुखी हैं। ज्यादा खुश या दुखी की स्थिति में लिया गया निर्णय गलत ही साबित होगा। जीवन में कोई भी निर्णय लेने से पहले खुद से पूछना चाहिए, कहीं ये निर्णय गुस्से में या किसी से अधिक लगाव के चलते तो नहीं ले रहे। क्योंकि ऐसी परिस्थिति में लिए गए निर्णय आग े पछतावा दिला सकते हैं। प्रारंभ से ही, भगवान कृष्ण की सबसे बार बार दोहराई जाने वाली सलाह ‘‘ निष्काम कर्म ‘‘ है, बिना किसी पुरस्कार की अपेक्षा या बिना फल की ईच्छा किए किए कर्म करना इसलिए हमें कोई भी निर्णय लेने से पहले फल का लालच नहीं करना चाहिए। भगवान कृष्ण ने कहाः “अर्जुन, तुम्हें केवल कर्म करने का अधिकार है; साथ ही कर्मों के फल पर आपका कोई अधिकार नहीं है। तुम्हें कर्मों के फल से प्रेरित होकर कार्य नहीं करना चाहिए और कभी भी निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए।” (2.47)हमारे अधिकांश निर्णय ‘‘मैं‘‘ और ‘‘मेरा‘‘ पर आधारित होते हैं और हम प्रभावित होते हैं क्योंकि हम उनके परिणामों और केवल परिणामों के बारे में सोचते हैं। ‘‘अहंकार‘‘ या ‘‘अहम् भाव‘‘ हमारे जीवन में सबसे बड़ी बाधा है। जब भी हम निस्वार्थ विचारों और कार्यों में संलग्न होते हैं जो दूसरों के कल्याण में योगदान करते हैं, तो हम मन की उच्च अवस्था में प्रवेश करेंगे और हम यह देखकर आश्चर्यचकित होंगे कि हमारी परियोजनाओं में बिल्कुल अजनबी भी हमारी मदद कर रहे हैं। परिणाम के प्रति हमारी आसक्ति के कारण जीवन दुःखमय, निराशाजनक आदि हो जायेगा। जब हम अपने आप को परिणाम से मुक्त कर लेंगे और इसके बजाय निःस्वार्थ कार्यों पर ध्यान केंद्रित करेंगे, तो हम बहुत खुश होंगे और अंततः सब कुछ भगवान को समर्पित कर दोः भगवान कृष्ण ने कहाः “सभी धर्म (कर्तव्यों) को त्याग दो और बस मेरे (ईश्वर की इच्छा) समर्पण कर दो । मैं तुम्हें कर्म के सभी बंधनों से मुक्ति दिलाऊंगा। डरना मत।‘‘( 18ः66) ईश्वर के प्रति समर्पण का अर्थ जीवन से भागना नहीं है। इसका अर्थ केवल ईश्वर को समर्पित होकर सभी विचार और कार्य करना है, ईश्वर को ‘‘कर्ता‘‘ बनाना है और आपको और मुझे केवल ईश्वर का सेवक बनाना है। भगवान के प्रति समर्पण करने से, भगवान ‘‘कर्ता‘‘ बन जाते हैं और हम सिर्फ भगवान के उपकरण बन जाते हैं

गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद कहते हैं कि मनुष्य को जो भी काम करना है उस पर पूरा भरोसा करना चाहिए।  वरना सफलता कभी नहीं मिलती है। कोई भी निर्णय लेने या काम करने से पहले उस पर पूरा विश्वास कर लेना चाहिए। अगर मन में किसी भी तरह की कोई शंका हो तो इस काम को न करें। अपने निर्णय के बारे में दुबारा सोचें। जो भी चीज समाज या बड़े समूह के लिए अच्छी न हो वो चीजें आपके लिए भी कभी फायदमे ंद न हो सकती। इसलिए कभी ऐसा कोई निर्णय न लें। गीता में साफ तौर पर कहा गया है कि जो भी व्यक्ति परमात्मा में विश्वास रखता है, उनका स्मरण करता है, वह हमेशा सही निर्णय लेता है। साथ ही उसकी हार कभी नहीं होती है।


गाण्डीव जमीं पर रखकर, युद्ध की नैय्या पार नहीं होती
गीता पढ़ने-स ुनने वालों की कभी हार नहीं होती
युवा अभिमन्यु जब साहसी बनकर चलता है
घुसता चक्रव्यूह में, सौ बार फिसलता है
घुसकर निकलना निकलकर घुसना न अखरता है
वीरगति पाने पर भी उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
गीता पढ़ने सुनने वालों की कभी हार नहीं होती

Scroll to Top